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दिवाली तक आते आते पूरी तरह दिवालिया हो चुका हूं। बस, लक्ष्मी से अब यही कामना है कि मेरे पिछले चार साल से सरकार के पास फंसे पंद्रह लाख दिलवा दें तो मैं चार चार लोनों की किस्तों से फ्री हो जाऊं। पंद्रह लाख के चक्कर में पता नहीं किस किससे सीना चौड़ा कर उधार ले चुका हूं। समझदारों से मेरी बस यही अपील है कि वे सबके झांसे में आएं, पर कम से कम सरकार के झांसे में मर कर भी न आएं।

अपने दिवालिएपन से निजात पाने के लिए डिजिटल इंडिया के दौर में दूर-दूर तक कोई उल्लू जुआरी नहीं दिख रहा। मैं हारे हुए राजनीतिज्ञ की तरह अब कोई भी दाव चलने को तैयार हूं। असल में जिंदगी में दिवालिया हुआ आदमी और राजनीति में कुर्सी से हारा राजनीतिज्ञ कुर्सी पाने के लिए कोई भी दाव चलने को सीना तान कर तैयार रहता है।

काश! दिवाली साल के अंत में न आकर साल के शुरू में आ जाया करती। भैया, यहां तक आते आते पेट्रोल, गैस ने खाली गाड़ी, बुझी रसोई के पेट में गैस बनानी तो शुरू कर ही दी है, मेरे खाली पेट में भी गैस बननी शुरू हो गई है। खाली पेट में भी गैस बनती है, अब पता चला। दूर दूर तक अंधेरा नजर आ रहा है। हे मेड इन चाइना के चांद तुम कहां हो? आओ, आकर हमारी भौतिकता की अमावस्या को हरो। हमारा भौतिक, धार्मिक गुजारा तुम्हारे बहिष्कारर के बिना संभव नहीं। कहने वाले जो चाहे कहते रहें। हे मेड इन चाइना के राम तुम कहां हो? हे मेड इन चाइना की लक्ष्मी तुम कहां हो? हमारे पूंजीपतियों के उद्योगों ने अब अपने भगवान का उत्पादन करना बंद कर दिया है। कहते हैं, उनके यहां के भगवान पर उत्पादन खर्चा चाइना के मुकाबले अधिक बैठता है। अपने भगवान अपनी फैक्टरी में बनाना घोटे का सौदा है। उद्योपति सब कुछ कर सकता है पर घोटे का सौदा कभी नहीं कर सकता। देश धर्म के हित में तो कतई नहीं। वैसे भी अपने राम तो बेचारे राजनीति का शिकार हुए बैठे हैं। राम ही जाने उन्हें अपने देश के राजनीतिज्ञों से कब मुक्ति मिले?

दिवालिया होने के बावजूद भी मैंने पटाखे फोड़ने का पूरा दम भरा हुआ है। जहां पटाखे हैं, वहां उल्लास है। शाम हो तो दो घंटों के बीच ही इतने पटाखे फोड़ दूं कि… कोर्ट को पता चले कि दो घंटे में भी हम पूरे दिन के बराबर पटाखे फोड़ने की महारत रखते हैं। धर्म के तो धर्म के, मेरे कान भी बहरे हो जाएं तो हो जाएं। वायु प्रदूषण अपने चरम पर चला जाए तो चला जाए। अब धर्म पटाखों के बीच ही तो बचा है। हे धर्माधिक्कारियो! जहां चोंचलापन नहीं, समझ लो वह धर्म धर्म-संकट में है। वैसे राजनीतिक पटाखे छोड़ने वाले तो बिन दिवाली भी पटाखे छोड़ते रहते हैं कभी इस मंच से, तो कभी उस मंच से। समझ में नहीं आता कोर्ट ऐसे पटाखे छोड़ने वालों पर समय की पाबंदी क्यों नहीं लगाता? इनके छोड़े पटाखों से सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक प्रदूशण इतना फैलता है कि पूछो ही मत।

दिवाली को राम का इंतजार वे भी कर रहे हैं जिन्हें आदर्शों से सख्त परहेज है। उन्हें लगता है शायद अबके राम उनकी भी राजनीतिक नाव पार लगा दें। राम आने के लिए कोर्ट के आदेश से लेकर अध्यादेश, धर्मादेश का मुंह ताक रहे हैं। राम अपने पर भी हंस रहे हैं और समाज पर भी। किस राजनीति में फंस गया यार? राजनीति के पाटों के बीच फंसना सबसे खतरनाक होता है। इनमें से जो बचकर निकल जाए सोई सुजान!

घर की वैभव लोलुप लक्ष्मी स्वर्ग की लक्ष्मी के इंतजार में बार-बार बेचौन हो बाहर के दरवाजे की ओर ताक रही है, उसके कान उल्लू के पंखों की फड़फड़ाहट सुनने को बेचौन हैं। कारण, मुझ जैसे उल्लू के मुंह से तो अब आह भी नहीं निकलती।

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हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की अर्की तहसील के म्याणा गांव में जन्में डॉ. अशोक गौतम हिमाचल प्रदेश के उच्चतर शिक्षा विभाग में एसोशिएट प्रोफेसर के  पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से साठोत्तर प्रमुख हिंदी नाटकों में अस्तित्ववादी-चेतना शोध विषय पर पीएच.डी किया है। मुख्य रूप से वे व्यंग्य लिखते हैं और “लट्ठमेव जयते”, “गधे ने जब मुंह खोला”, “झूठ के होलसेलर”, “खड़ा खाट फिर भी ठाठ”, “ये जो पायजामे में हूं मैं”, “साढ़े तीन आखर अप्रोच के”, “मेवामय ये देश हमारा”, “फेसबुक पर होरी”,  “पुलिस नाके पर भगवान”, “वफादारी का हलफ़नामा” और “नमस्कार को पुरस्कार” उनके प्रकाशित व्यंग्य संग्रह हैं। उनकी रचनाएं विगत 30 वर्षों से देश के प्रतिष्ठित अखबारों, पत्रिकाओं और वेब-पोर्टल्स में निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। संपर्कः- गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212 (हिमाचल प्रदेश) मोबाइल नम्बर : 9418070089, ई-मेल : [email protected]