सात नवंबर की रात से दिल्ली व उसके आसपास घना स्मॉग क्या छाया, तमाम लोगों ने सारा दोष पंजाब-हरियाण के किसानों के पराली जलाने पर डाल दिया गया। वातावरण के जहरीले होने की ऐसी इमरजेंसी घोषित की गई कि पांच दिन बाद से दिल्ली महानगर की सड़कों पर वाहनों की सम-विषम योजना शुरू की गई है। यही नहीं यह पांबदी केवल दिल्ली की सीमा में लागू होगी, दिल्ली के विस्तारित क्षेत्र हो गए गाजियाबाद, नोएडा, फरीदाबाद या गुरूग्राम में ऐसा नहीं होगा। अभी वह विज्ञान समझ से परे ही है कि वायु को जहरीला करने वाला धुआं क्यों कर सीमा पार कर दिल्ली तक नहीं आता है। हकीकत तो यह है कि दिल्ली एनसीआर में पूरे साल, महज बरसात के पंद्रह से पच्चीस दिन छोड़ कर, वायु प्रदूषण के यही हालात रहते हैं। गरमी में  फैंफड़ों में जहर भरने का देाष तापमान व राजस्थान-पाकिस्तान से आने वाली धूल को दिया जाता है तो ठंड में इसका देाषी किसानों को परली जलाने के कारणब ताया जाता है। पर्यावरण संरक्षण के मामले में विस्तारित दिल्ली का लगभग देा करोड़ आबादी वाला समाज और सरकार ठीक उन आदर्शवादियों की तरह है जो चाहते हैं कि भगत सिंह  घर-घर में पैदा हो, लेकिन उनके घर नहीं। यह कटु तथ्य है कि दिल्ली एनसीआर में पूरे साल हवा मान स्तर की तुलना में ‘6बहेद खराब’ स्तर की होती है और इसका मुख्य कारक यहीं छिपा है।

इसमें कोई शक नहीं कि दिल्ली के हालात भयावह हैं, इसमें भी कोई संशय नहीं कि खेत में खड़े ठूंठों को जलाने से पैदा हुआ धुआं परिवेश को जहरीला बनाने में कुछ भूमिका अदा कर रहा हैं। लेकिन हकीकत तो यह है कि दिल्ली की हवा को इतना घना बनाने में खुद दिल्ली-एनसीआर ही बड़ा दोषी है। सनद रहे इन दिनों हवा की गति बहुत कम है और ऐसे में पंजाब की तरफ से हवा के साथ काले धुंए के उड़ के आने की मात्रा बेहद कम है।

दरअसल इस खतरे के मुख्य कारण 2.5 माइक्रो मीटर व्यास वाला धुएं में मौजूद एक पार्टिकल और वाहनों से निकलने वाली गैस नाइट्रोजन ऑक्साइड है, जिसके कारण वायु प्रदूषण से हुई मौतों का आंकड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। इस खतरे का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि वायु प्रदूषण करीब 25 फीसदी फेंफड़े के कैंसर की वजह है। इस खतरे पर काबू पा लेने से हर साल करीब 10 लाख लोगों की जिंदगियां बचाई जा सकेंगी ।

यह स्पष्ट हो चुका है कि दिल्ली में वायु प्रदूषण का बड़ा कारण यहां बढ़ रहे वाहन, ट्रैफिक जाम और राजधानी से सटे जिलों में पर्यावरण के प्रति बरती जा रही कोताही है। हर दिन बाहर से आने वाले कोई अस्सी हजार ट्रक या बसें यहां के हालात को और गंभीर बना रहे हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि समस्या बेहद गंभीर है। सीआरआरआई की एक रपट के मुताबिक राजधानी के पीरागढी चौक से हर रोज 315554 वाहन गुजरते हैं और यहां जाम में 8260 किग्रा ईंधन की बर्बादी होती है। इससे निकलने वाला कार्बन 24119किग्रा होता है। कनाट प्लेस के कस्तूरबागांधी मार्ग पर प्रत्येक दिन 81042 मोटर वाहन गुजरते हैं व रेंगते हुए चलने के कारण 2226 किग्रा इंधन जाया करते हैं।। इससे निकला 6442 किग्रा कार्बन वातावरण को काला करता है। और यह हाल दिल्ली के चप्पे-चप्पे का है। यानि यहां सडकों पर हर रोज कई चालीस हजार लीटर इंधन महज जाम में फंस कर बर्बाद होता है। कहने को तो पार्टिकुलेट मैटर या पीएम के मानक तय हैं कि पीएम 2.5 की मात्रा हवा में 50पीपीएम और पीएम-10 की मात्रा 100 पीपीएम से ज्यादा नहीं होना चाहिए। लेकिन दिल्ली का कोई भी इलाका ऐसा नहीं है जहां यह मानक से कम से कम चार गुणा ज्यादा ना हो। पीएम ज्यादा होने का अर्थ है कि आंखों मंे जलन, फैंफडे खराब होना, अस्थमा, कैंसर व दिल के रोग।

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यदि राष्ट्रीय भौतिक विज्ञान प्रयोगशाला के आंकउ़ों पर भरोसा करें तो दिल्ली में हवा के साथ जहरीले कणों के घुलने में सबसे बड़ा योगदान 23 फीसदी धूल और मिट्टी के कणों का है। 17 प्रतिशत वाहनों का उत्सर्जन है। जनरेटर जैसे उपकरणों के चलते 16 प्रतिशत सात प्रतिशत औद्योगिक उत्सर्जन और 12 प्रतिशत पराली या अन्य जैव पदार्थों के जलाने से हवा जहरीली हो रही है। सबसे ज्यादा दोषी धूल और मिट्टी के कण नजर आ रहे हैं और इनका सबसे बड़ा हिस्सा दिल्ली एनसीआर में दो सौ से अधिक स्थानों पर चल रहे बड़े निर्माण कार्यों, जैसे कि मेट्रो, फ्लाई ओवर और इसमें भी सबसे ज्यादा एनएच-24 के चौड़ीकरण की उपज है। एक तो ये निर्माण बगैर वैकल्पिक मार्ग उपलब्ध करवाए व्यापक स्तर पर चल रहे हैं, दूसरा ये अपने निर्धारित समय-सीमा से कहीं बहुत-बहुत दूर हैं। इनमें रिंग रोड़ पर साउथ-एक्सटेंशन मेंट्रो कार्य, गाजियाबाद में मेट्रो विस्तार व एलिवेटेड रोड प्रोजेक्ट सहित दर्जनों कार्य हैं। ये धूल-मिट्टी तो उड़ा ही रहे हैं, इनके कारण हो रहे लंबे-लंबे जाम भी हवा को भयंकर जहरीला कर रहे हैं। राजधानी की विडंबना है कि तपती धूप हो तो भी प्रदूषण बढ़ता है, बरसात हो तो जाम होता है व उससे भी हवा जहरीली होती है। ठंड हो तो भी धुंध के साथ धुंआ के साथ मिल कर हवा जहरीली । याद रहे कि वाहन जब 40 किलोमीटर से कम की गति पर रैंगता है तो उससे उगलने वाला प्रदूषण कई गुना ज्यादा होता है।

 

कुछ ही दिनों पहले ही विश्व स्वास्थ संगठन ने दिल्ली को दुनिया का सबसे ज्यादा दूषित वायु वाले शहर के तौर पर चिन्हित किया है। इसके बावजूद यहां के निर्माण कार्य ना तो जन स्वास्थय की परवाह कर रहे हैं ना ही पर्यावरण कानूनों की। गत सात महीने से दिल्ली के लगभग बीच से निकलने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग 24 के चौड़ीकरण का अनियोजित और बेतरतीब चौड़ीकरण दिल्ली के लिए जानलेवा बन रहा है। सनद रहे यह सड़क दिल्ली एनसीआर की एक तिहाई आबादी के दैनिक आवागमन के अलावा कई राज्यों को जोड़ने वाला ऐसा मार्ग है जो महानगर के लगभग बीच से गुजरता है। एक तो इसके कारण पहले से बनी सड़कें संकरी हो गई हैं, फिर बगैर वैकल्पिक व्यवस्था किए इस पर वाहन का बोझ डाल दिया गया। कालेखां से गाजीपुर तक का बामुश्किल नौ किलोमीटर का रास्ता पार करने में एक वाहन को एक घंटा लगा रहा है। उसके साथ ही खुदाई, मिक्सिंग प्लांट से उड़ रही धूल अलग है।

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ठीक इसी तरह के लगभग 200 निर्माण कार्य राजधानी में अलग-अलग स्थानों पर चल रहे हैं जहां हर दिन कोई 65 करोड़ रूपए का ईंधन जल रहा है लेागों के घंटे बर्बाद हो रहे हैं। इसके चलते दिल्ली की हवा में कितना जहर घुल गया है, इसका अंदाजा खौफ पैदा करने वालो आंकड़ों कों बांचने से ज्यादा डाक्टरों के एक संगठन के उस बयान से लगाया जा सकता है जिसमें बताया गया है कि देश की राजधानी में 12 साल से कम उम्र के 15 लाख बच्चे ऐसे है, जो अपने खेलने-दौड़ने की उम्र में पैदल चलने पर ही हांफ रहे हैं। इनमें से कई सौ का डाक्टर चेता चुके हैं कि यदि जिंदगी चाहते हो तो दिल्ली से दूर चले जाएं।

जाहिर है कि यदि दिल्ली की सांस थमने से बचाना है तो यहां ना केवल सड़कों पर वाहन कम करने होंगे, इसे आसपास के कम से कम सौ किलोमीटर के सभी षहर कस्बों में भी वही मानक लागू करने होंने जो दिल्ली शहर के लिए हों। अब करीबी शहरों की बात कौन करे जब दिल्ली में ही जगह-जगह चल रही ग्रामीण सेवा के नाम पर ओवर लोडेड वाहन, मेट्रो स्टेशनों तक लोगों को ढो ले जाने वाले दस-दस सवारी लादे तिपहिए, पुराने स्कूटरों को जुगाड़ के जरिये रिक्शे के तौर पर दौड़ाए जा रहे पूरी तरह गैरकानूनी वाहन हवा को जहरीला करने में बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। सनद रहे कि वाहन सीएजी से चले या फिर डीजल या पेट्रोल से, यदि उसमें क्षमता से ज्यादा वजन होगा तो उससे निकलने वाला धुआं जानलेवा ही होगा। यदि दिल्ली को एक अरबन स्लम बनने से बचाना है तो इसमें कथित लोकप्रिय फैसलों से बचना होगा, जिसमें सबसे महत्वपूर्ण है यहां बढ़ रही आबादी को कम करना। इसे अलावा दिल्ली में कई स्थानों पर सरे राह कूड़ा जलाया जा रहा है जिसमें घरेलू ही नहीं मेडिकल व कारखानों का भयानक रासायनिक कूड़ा भी हे। ना तो इस महानगर व उसके विस्तारित शहरों के पास कूड़ा-प्रबंधन की कोई व्यवस्था है और ना ही उसके निस्तारण्ण का। सो सबसे सरल तरीका उसे जलाना ही माना जाता है। इससे उपजा धुआँ पराली से कई गुना ज्यादा है।

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आंकड़ों और तथ्यों को गौर से देखें तो यह स्पष्ट होता है कि वाहनों के सम-विषम की योजना महज औपचारिकता मात्र है और इससे किसी भी तरह से वायू प्रदूषण पर नियंत्रण लगने वाला नहीं है। फिर जब यह त्रासदी साल के 340 दिनों की है तो पांच दिन में क्या फर्क पडेगा? वैसे भी राजधानी क्षेत्र में साइ फीसदी वाहन दो पहिये हैं, जो कि सर्वाधिक प्रदूषण करते हैं, लेकिन वे पाबंदी से बाहर हैं, सीएनजी वाहन, वीवीआईपी अैर आकस्मिक सेवा वाहन, महिलओं के वाहन, स्कूल छोड़ने जा रहे वाहन भी इससे बाहर हैं। ऑल इंडिया टूरिस्ट के परमिट पर पंजीकृत ओला-उबर जैसी कंपनियों के डीजल वाहन भी इस पाबंदी में चलते ही हैं। जाहिर है कि महज 25 फीसदी लोग ही इसके तहत सड़कों पर अपनी कार ले कर नहीं आ पाएंगे।

सनद रहे कि इतनी बड़ी आबादी के लिए चाहे मेट्रो चलाना हो या पानी की व्यवस्था करनी हो, हर काम में लग रही उर्जा का उत्पादन दिल्ली की हवा को विषैला बनाने की ओर एक कदम होता है। यही नहीं आज भी दिल्ली में जितने विकास कार्यों के कारण जाम लग रहा है और धूल उड़ रही है वह यहां की सेहत ही खराब कर रही है, भले ही इसे भविष्य के लिए कहा जा रहा हो। लेकिन उस अंजान भविष्य के लिए वर्तमान बड़ी भारी कीमत चुका रहा है। दिल्लीवासी इतना प्रदूषण खुद फैला रहे हें और उसका दोष किसानों पर मढ़ कर महज खुद को ही धोखा दे रहे हैं। बेहतर कूड़ा प्रबंधन, सार्वजनिक वाहनों को एनसीआर के दूरस्थ अंचल तक पहुंचाने, राजधानी से भीड़ को कम करने के लिए यहां की गैरजरूरी गतिविधियों व प्रतिष्ठानों को कम से कम दो सौ किलोमीटर दूर शिफ्ट करने, कार्यालयों व स्कूलों के समय और उनके बंदी के दिनों में बदलाव जैसे दूरगामी कदम ही दिल्ली को मरता शहर बनाने से बचा सकते हैं। ऑड- इवन महज एक नारेबाजी सरीका दिखावटी कदम है।

(ये लेखक के अपने विचार हैं) (Views expressed are personal)   श्रोत : लेखक का ब्लॉग 

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