(अरुणा मुकिम के नए उपन्यास ‘दक्षायणी’ के लोकार्पण और परिचर्चा के दौरान मौजूद अतिथिगण)
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दुकान किताब की / महज इक दुकान नहीं,
जमा है इसमें समंदर / उफनते खयालों का…

युवा शायर सतेन्द्र ‘मनम’ का यह शे’र वाणी प्रकाशन की निदेशक अदिति माहेश्वरी गोयल ने कार्यक्रम का समाहार करते हुए पढ़ा तो मैं परंपरा तोड़ने को बाध्य हो गया। भले ही शेर किताब की ‘दुकानों’ को लक्ष्य करके लिखा गया हो, लेकिन यह पुस्तकों पर बिलकुल सटीक बैठता है। और आज जब विश्व पुस्तक दिवस (23 अप्रैल) है तो मौका और दस्तूर दोनों है कि हम पुस्तकों के महत्व को याद करें, जिनकी महत्ता का बखान रवींद्रनाथ ठाकुर, विवेकानंद, महात्मा गांधी से लेकर राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर ने अपनी सकारात्मक/समादृत टिप्पणियों में की है।

पुस्तकें ज्ञान की पाठशालाएं कही गई हैं, तो यूं ही नहीं। वे सिर्फ हमें दुनिया-जहान की जानकारियां ही नहीं देतीं वे हमें मां, गुरु, मित्र और मार्गदर्शक बनकर सामाजिक जीवन की राह भी दिखाती हैं। यही नहीं, पढ़ना ही हमें लिखना भी सिखाता है। अपने किसी आलेख में उल्लिखित एक युवतर विचार भी यहां दोहराने का लोभसंवरण मैं नहीं कर पा रहा हूं। पांच साल पहले कथाकार आकांक्षा पारे ने रमाकांत पुरस्कार ग्रहण के समय दिए वक्तव्य में कहा था कि कॉमिक्स और उपन्यास पढ़ने की विकट आदत ने ही उन्हें लिखने के लिए प्रेरित किया।

खैर, उस किताब पर लोगों के विचार जानें जो मिथ ही सही, अपने प्रेम के लिए पिता और परिवेश से विद्रोह कर जीवन होम करने को तत्पर हुई प्रथम क्रांतिकारिणी पार्वती के बारे में है।

अरुणा मुकिम के नए उपन्यास ‘दक्षायणी’ के लोकार्पण और परिचर्चा आयोजन नयी दिल्ली के मण्डी हाउस स्थि‌त फिक्की फेडरेशन हाउस में बीते शनिवार को किया गया।

इस मौके पर शायर, फ़िल्म गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख़्तर ने रामायण और महाभारत न पढ़ने वाले को गैरइनसान का दर्जा देते हुए कहा कि हमारी भाषा हमारी जड़ है। जितनी ये बाहर फैले उतनी ही जड़ें मजबूत होंगी। माइथोलोजी को नए विश्लेषण के साथ लिखा जाना चाहिए। अरुणा जी ने वह काम बखूबी किया है। राजनीतिक विश्लेषक डॉ. वेद प्रताप वैदिक का कहना था कि ‘पुस्तक में जो सती है वह सम्मान की रक्षा करने वाली है। इसमें दर्शन की बारीकियाँ देखने को मिलती हैं।’

संचालन करते हुए हास्यकवि सुरेन्द्र शर्मा ने कहा कि यह पुस्तक शिव-पार्वती पर आधारित है। नारियों को उचित सम्मान देने के लिए ऐसी पुस्तक की आज के समय में प्रासंगिकता है।

लेखिका अरुणा मुकिम ने स्वयं पुस्तक में ‘शिव और शक्ति के प्रेम के वास्तविक स्वरूप की अद्भुत व्याख्या’ की सराहना की और कहा कि इसमें उन्होंने नारी जीवन के संघर्षों एवं विषमताओं का अत्यन्त प्रभावशाली चित्रण किया है। उन्होंने वाणी प्रकाशन के प्रबन्ध निदेशक अरुण माहेश्वरी और अदिति माहेश्वरी का आभार प्रकट किया। उन्होंने जावेद अख्तर के लेखन की प्रशंसा की और बताया कि महेश भट्ट ने ही पुस्तक के बारे में कवर पृष्ठ पर टिप्पणी लिखी है।

फ़िल्म निर्माता/निर्देशक, पटकथा लेखक महेश भट्ट ने बताया कि शिव से उनका रिश्ता बहुत पुराना है। कहा,‘मैंने बचपन में अपनी शिया मुसलमान माँ से पूछा कि महेश का मतलब क्या है तो उन्होंने कहा कि महाईश यानी की सबसे बड़ा ईश्वर। ये कहानियाँ तभी ज़िन्दा रहेंगी जब हम एक-दूसरे का हाथ थाम कर चलें।‘ सैफ़ुद्दीन सोज़ ने बताया कि ‘अरुणा जी ने उनके कहने पर ही दोस्तोव्स्की, टॉल्स्टोय वगैरह को पढ़ा और आज उनके लेखन में इस पाठ के दर्शन की छवि दिखती है।‘ नफीसा अली ने भी अरुणा के लेखन को सराहा।

पुस्तक की प्रकाशक और कार्यक्रम संयोजक संस्था वाणी प्रकाशन के प्रबंध निदेशक अरुण माहेश्वरी ने सभी दिग्गजों का स्वागत किया और सान्निध्य से अवसर को ऐतिहासिक बनाने के लिए धन्यवाद दिया।

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