दिल्ली की आबोहवा में सांस लेना मुसीबत को दावत देना बनता जा रहा है। ग्रीन ट्रिब्यूनल से लेकर हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक लगातार प्रदूषण के बढ़ते स्तर का संज्ञान लेकर केन्द्र और राज्य सरकार से जवाब तलब करते रहे हैं। परंतु दोनों सरकारें कोर्ट में शपथ पत्र देकर न्यायपालिका को गुमराह करने के अलावा कुछ भी नही कर रही हैं। इसका जिन्दा सबूत है दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के एक मुख्य कारण भ्रष्टाचार पर दोनों सरकारों का आंखे मूंदे रहना और हालात को बिगड़ते हुए देखकर भी खामोश रहना।

यहां तक कि शिकायत किये जाने पर पुलिस और नगर निगम और विभागों को तो छोड़िये केन्द्र सरकार के अनुसार दिल्ली का वास्तविक प्रशासक कहे जाने वाले उप-राज्यपाल महोदय का सचिवालय भी ऐसी शिकायतों पर कोई कार्रवाई नही करता है और खामोश बना रहता है।

दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में प्रदूषण को नियन्त्रित करने के मद्देनजर डीजल बसों पर काफी पहले नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने रोक लगा दी थी। परंतु प्राइवेट बस आपरेटरों का लालच और दिल्ली पुलिस और प्रशासन के भ्रष्टाचार गठजोड़ ने ग्रीन ट्रिब्यूनल की कोशिशों पर ना केवल पानी फेर दिया है बल्कि दिल्ली को यूपी और हरियाणा नम्बर की डीजल बसों अवैध ठिकाना बनाकर छोड़ दिया है। यह दिल्ली में चलती अवैध बसें बगैर रूट परमिट के दिल्ली यूपी और अन्य पड़ोसी राज्यों के विभिन्न रूटों पर नियमित रूप से चलती हैं, जो ना केवल दिल्ली के पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा हैं बल्कि राजस्व की दिन दहाड़े लूट भी है।

उत्तर पूर्वी दिल्ली के कुछ लोगों ने इनके खिलाफ शिकायत की तो स्थानीय पुलिस अधिकारी कभी इसे ट्रेफिक पुलिस का मामला बताते रहे और कभी नगर निगम के अधिकार क्षेत्र का मामला। यहां तक कि थाना वेलकम के पूर्व थानाध्यक्ष प्रशांत कुमार ने तो उनके थाना क्षेत्र में इन बसों की अवैध पार्किंग और अवैध संचालन पर सीधे दो टूक जवाब देते हुए कहा कि इसमें हम क्या कर सकते हैं। यह तो नगर निगम का मामला है। इसी प्रकार का रवैया बाकी पुलिस विभाग का भी है।

– इस प्रकार के अवैध बस संचालन के केवल उत्तर पूर्वी दिल्ली में ही दर्जनों ठिकाने हैं। इनकी सवारियां और सामान उठाने के कई ठिकाने यमुनापार के विभिन्न इलाकों में बने हुए हैं, जिन्हें इनके छोटे अन्तर्राज्यीय बस अड्डे भी कहा जा सकता है। इनके इन ठिकानों में सीलमपुर मेट्रो स्टेशन के पास, शास्त्री पार्क में एचपी गोदाम के पास, यमुना विहार सी-12 के पास, कर्दमपुरी मौजपुर रोड़, मेट्रो स्टेशन जाफराबाद के पास, शाहदरा उत्तरी जोन निगम कार्यालय के पास, रोड़ संख्या 65 मुस्कान के सामने, खजूरी चैक के पास, भजनपुरा के पास, गांवड़ी रोड़ यमुना पुश्ता, श्मामलाल काॅलेज के सामन और बिहारी कालोनी रोड़ कांति नगर के पास इनके यह अवैध बस स्टैंड अथवा बस अड्डे हैं। यहीं से यह निजी बसों का यह माफिया तमाम कानूनों और नियमों को ताक पर रखकर अपना अवैध रूट चलाने का कारोबार करता है।

-इन बसों की शिकायत बाकायदा नंबर सहित पहले संयुक्त पुलिस आयुक्त ट्रेफिक को उनके फेसबुक पेज पर दी गई और उसके बाद उपरोक्त शिकायत को ऐसी ही 30 से 40 बसें के नंबर और उनके उपरोक्त संचालन के ठिकानों के साथ उप-राज्यपाल कार्यालय को दी गई। परंतु कोई कार्रवाई अभी तक नही हुई।

-संचालन से जुडे़ कुछ लोगों के अनुसार केवल उत्तर पूर्वी दिल्ली जिले से ही ऐसी अवैध रूट की 200 के लगभग बसों का संचालन होता है।

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-दिल्ली से मुरादाबाद, रामपुर, बरेली, शाहजहांपुर, अमरोहा, गजरौला, संभल, हसनपुर आदि उत्तर पूर्वी दिल्ली से चलने वाली बसों के प्रचलित रूट हैं। यह बसें नियमित रूप से सवारियां और सामान ले जाने का काम करती हैं।

-नगर निगम की चुंगियों पर भी अक्सर यह बसे बगैर रसीद के पैसा चुकाकर दिल्ली में निगम के कर्मचारियों की मिलीभगत से दाखिल होती हैं।

-दिल्ली के हर चौराहे के ट्रेफिक अधिकारी इन्हे बगैर अवरोधः के जाने देते है! शिकायत  जाने पर औपचारिकता के लिए मामूली चालान काट दिया जाता है बस को जब्त नहीं किया जाता है ! जाहिर है दोनों के बीच कोई समझदारी कोई व्यवस्था कायम है !

-पुलिस से इनकी मिलीभगत किस स्तर पर है इसका सबसे बड़ा सबूत इनका उत्तर पुर्वी दिल्ली जिला पुलिस उपायुक्त कार्यालय के बाहर से संचालन है। अंधेरा होते ही पुलिस उपायुक्त कार्यालय के बाहर पेट्रोल पंप पर कतार से खड़ी बसें अराजक भ्रष्टाचार की कहानी बयां करती है।

-यही हाल शाहदरा उत्तरी जोन के नगर निगम कार्यालय का भी है। जिसके सामने से और पीछे से ऐसी दर्जन भर से ज्यादा बसे अलग अलग समय पर संचालित होती हैं।

-अक्टूबर महीने में एसीपी सीलमपुर से शिकायत करने पर जब एसीपी सीलमपुर की सख्ती के बाद कुछ बसें थाने में कईं दिनों के लिए बंद कर दी गई तो अवैध बस आपरेटर माफिया ने ग्रामीण सेवा और वेन से सवारियों को यूपी बार्डर ले जाने का कारोबार किया था। जिससे यह तथ्य सामने आ गया था कि इन बसों का संचालन अवैध है और इन्होंने दिल्ली में अवैध तरीके से अपने अन्तर्राज्य बस अड्डे बना रखे हैं। जहां से ये लोग रोजाना सवारियां और सामान ले जाते हैं।

-दिल्ली के परिवहन विभाग ने 2016 और 2017 में कईं बार अवैध बसों को जब्त करने का दावा किया है। यहां तक कि जून 2017 में दिल्ली सरकार ने ऐसी 1000 अवैध बसों को जब्त करने का दावा किया था और 24 जून 2017 के अखबारों में यह खबर प्रकाशित हुई थी। परंतु मालूम नही दिल्ली सरकार की अवैध बसों की परिभाषा क्या है। क्योंकि दिल्ली में अभी भी विभिन्न रूटों पर ऐसी अवैध डीजल बसें धुंए के गुब्बार उडाती घूमती हैं।

-29 सितंबर 2017 को रात 10.30 बजे वेलकम थाना क्षेत्र की जनता कालोनी के एक व्यक्ति की बाईक ऐसी ही बसों के तथाकथित बस स्टैंड की दो यूपी नंबर बसों के बीच से चोरी हो गयी शिकायतकर्ता के लाख गुहार करने पर भी एफआइआर में उपरोक्त अवैध रूट की बसों का जिक्र नही किया गया। शिकायतकर्ता के जोर देने पर शिकायत दर्ज करनेे वाले पुलिसकर्मी ने कहा कि तुम्हें एफआइआर से मतलब है कि इन बसों से हम बसों का हवाला नही देंगे रिपोर्ट में।

-उपरोक्त मामले की शिकायत पुलिस उपायुक्त उत्तर पूर्वी दिल्ली जिले को की गई कोई कार्रवाई नही हुई। अवैध बसे अपनी जगह पर हैं, एफआइआर से बसों का हवाला गायब करने वाला पुलिसकर्मी सुरक्षित है।

दरअसल, दिल्ली शहर की राज्य सरकार और केन्द्र घोषित असली प्रशासक दोनों ही प्रदूषण को काबू में रखने के प्रयासों के दावें तो करते हैं परंतु वे कागजी और शपथपत्र तक ही सीमित होते हैं और न्यायपालिका और शहर की जनता को गुमराह करने वाले होते है। वास्तव में गैस चैंबर बनती दिल्ली और दिल्लीवासियों की इस क्रूर राजनीतिक खेल को कोई परवाह नही है। यदि परवाह होती तो केवल भ्रष्टाचार पर लगाम लगाकर ही प्रदूषण के आधे जहर को कम किया जा सकता था। लेकिन ऐसा हो नही रहा है जो दिल्ली के दोनों प्रशासकों चुने हुए और नियुक्त किये हुए की नेकनीयती और कोशिशों पर सवाल उठाता है।

 

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(यह लेखक के निजी विचार हैं)

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सामाजिक न्याय के प्रखर पैरोकार महेश राठी वरिष्ठ पत्रकार हैं| प्रमुख अखबारों, पत्रिकाओं और वेब-पोर्टल्स में उनके आलेख प्रकाशित होते रहे हैं| दिल्ली से प्रकाशित होने वाले साप्ताहिक अखबार मुक्ति संघर्ष के साथ जुड़े रहते हुए वे स्वतंत्र रूप से राजनैतिक, सम-सामायिक और जन-सरोकार के विषयों पर लिखते हैं| महेश राठी का लेखन निर्भीक और जमीनी पत्रकारिता का बेहतरीन उदाहरण है| जनवाद की पुरजोर पैरवी करते हुए उनकी कलम कभी सत्ता से जा टकराती है, तो कभी छद्म-राष्ट्रवाद को बेनकाब करती है| हिंद वॉच मीडिया के लिए वे नियमित रूप से लिखते रहे हैं|