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योगेश किसलय

योगेश किसलय झारखंड के वरिष्ठ पत्रकार हैं। इन्होंने झारखंड से विजुअल और प्रिंट मीडिया में लम्बी पारी खेली है। वे प्रदेश के वर्तमान मुख्यमंत्री रघुवर दास को बतौर प्रेस सलाहकार अपनी लम्बी सेवा भी दे चुके हैं। स्थानीय भाषा, संस्कृति, सामाजिक ताने-बाने और राजनीति की गहरी समझ रखने वाले किसलय सम्प्रति सम-सामयिक विषयों पर बेबाक लेखन कर रहे हैं।

 

                                                                                                             〈〈 योगेश किसलय
हुत दिनों बाद मीडिया, खासकर कुछ अखबारों ने झारखंड के बिगड़े हालात को पर्याप्त तरीके से दिखाना शुरू किया है। खूंटी में पत्थलगड़ी के बाद पांच लड़कियों के गैंगरेप की खबर और अब आजादी मांग रहे पत्थलगड़ी समर्थकों की हिंसक हरकत। दरअसल इसके पीछे सिर्फ दो ही कारण हैं। एक ईसाई मिशनरियों की राज्य विरोधी गतिविधियां और दूसरी सरकार की प्रशासनिक नाकामी।

अब मीडिया सरकार की जगह स्थानीय प्रशासन या पुलिस के कुछ अधिकारियों का नाम गिनाकर अपना पल्ला झाड़ ले रही है। साफ साफ क्यों नहीं  बताते-दिखाते कि सरकार नाकाम रही है। आदिवासियों को विश्वास में लेने की कोशिश नहीं की गई है। मिशनरियों की हरकत पर सरकार ने पाबंदी नहीं लगाई है।

एक पादरी, दुर्भाग्य से उसे ईसाई मतावलम्बी फादर कहते हैं, पांच बेटियों को बलात्कारियों के हाथ सौंप देता है और विपक्ष न सिर्फ मौन है बल्कि आरोपी पादरी की बेगुनाही के राग में सुर मिला रहा है, सिर्फ इसलिए कि वहां का विधायक ईसाई है। चुनाव में  ईसाइयों के वोट लेने हैं, इसलिए चुप है। मोमबत्ती गैंग चुप है क्योंकि उन्हें ऐसी ही संस्थाओं से फंडिंग होती है। उन्ही के पैसों से घर चलता है। मोमबत्ती खरीद लेंगे तो फंडिंग भी बंद हो जाएगी। छिटपुट लोग अल्बर्ट एक्का चौक पर फोटो खिंचवाकर और मन ही मन फोटो नही छपने की प्रार्थना कर तेल पानी का जुगाड़ करने लग गए हैं।

वाह रे विपक्ष! इतने में तो राज्य में आंदोलन का बिगुल फूंक दिया जाना चाहिए था, लेकिन जहां वोट ही ऑक्सीजन हो वहां कौन मिशनरियों से पंगा लेगा? खूंटी, जहां देश का संविधान जलाया जा रहा है, मानवता कुचली जा रही है, जनप्रतिनिधि को औकात बताया जा रहा है, मीडिया को धमकाया जा रहा है, यह क्या कश्मीर से अलहदा स्थिति है?

भारतीय संविधान और संप्रभुता से आजादी का यह नारा राजधानी रांची से महज 30 किलोमीटर दूर गूंज रहा है। सुरक्षाबलों/पुलिस के खिलाफ यहां भी पत्थरबाजी हो रही है।वाहन जलाए जा रहे हैं, सुरक्षाबलों का अपहरण हो रहा है, अफीम की खेती खुलेआम की जा रही है, समानांतर सरकार गठित की जा रही है, रिज़र्व बैंक के समांतर बैंक स्थापित किया जा रहा है, सांसद के घर हमला हो रहा है, मीडिया तक के  कई इलाकों में प्रवेश पर प्रतिबंध है और हम कह रहे हैं कि राज्य में सरकार का इक़बाल कायम है।

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(प्रतीकात्मक तस्वीर)

पत्थलगड़ी समर्थकों की नीयत तो तब सामने आ गयी जब उन्होंने पाँच लड़कियों के साथ कुकर्म किया। पत्थलगड़ी करने वालों में अधिकांश ईसाई आदिवासी है। नेतृत्वकर्ता तो बेशक ईसाई आदिवासी ही है, जिन्हें चर्च का पूरा साथ मिल रहा है।

 

अखबार खुलकर बोलने में हिचक रहे हैं कि इसमें चर्च का भी हाथ है। अखबार कयास नही लगा सकते लेकिन सरकार और उसकी एजेंसियों को यह बताने में डर कैसा? एक बात तय है कि यहाँ आदिवासियों के साथ लगातार संवाद करने की सरकार की कोशिश हुई ही नहीं। सरकार इतनी एरोगेंट है कि द्विपक्षीय वार्ता हो ही नही सकती।

मुझे लगता है कि जब तक राज्य में सरकार का मुखिया आदिवासी नहीं होगा तब तक गैर आदिवासी को  पचा पाना  आदिवासी/मूलवासियों के लिए संभव नही है। विपक्ष तो यह सोच कर गदगद है कि स्थितियाँ इतनी बिगड़ जाएं कि 2019 में मजबूरन जनता उन्हें हीं चुने, इसलिए वे चुप लगाना ही बेहतर समझ रहे हैं। लेकिन क्या राजनीति सिर्फ वोट और सत्ता तक ही सीमित है?

भले कोई कह ले कि भारत का लोकतंत्र सफल व्यवस्था है, लेकिन जनता और मतदाता बेहद भुलक्कड़, नासमझ, भावावेग में बहने वाली, जाति-धर्म में बंटी हुई और लोभी है। आप छाती पीटते रहिये, समझदारी की गुहार लगाते रहिये, वे वही करेंगे जो अब तक करते आये हैं। एक दारू की बोतल पर संविधान, लोकतंत्र, देश, समाज, कुर्बान। यहां कुछ होने वाला नही। गनीमत है कि जुकरबर्ग ने फेसबुक खुला रखा है वरना गुस्सा छाती जलाते रहता और मुझ सहित बहुत से लोग गुस्सा जाहिर किये बगैर खर्च हो चुके होते और खर्च होने की वजह भी किसी को पता भी नहीं चलती।

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‌मजरूह सुल्तानपुरी की कसक याद आती है ……..
ज़बाँ हमारी न समझा यहाँ कोई ‘मजरूह’
हम अजनबी की तरह अपने ही वतन में रहे
 (ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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