Sunday, December 16, 2018

कितना अच्छा होता है (कविता) : सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

एक-दूसरे को बिना जाने पास-पास होना और उस संगीत को सुनना जो धमनियों में बजता है, उन रंगों में नहा जाना जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं । शब्दों की खोज...

चिड़ियाघर के तोते (कविता)- बुद्धिनाथ मिश्र

चिड़ियाघर के तोते को है क्या अधिकार नहीं पंख लगे हैं फिर भी उड़ने को तैयार नहीं। धरती और गगन का मिलना एक भुलावा है खर-पतवारों का सारे क्षितिजों पर दावा...

गरीबी पर एक गंभीर चर्चा (व्यंग्य)- अर्चना चतुर्वेदी

विश्वास मानिए जितना हमारा देश बड़ा है, हमारे देशवाशियों का दिल उससे भी बहुत बड़ा है। उस बड़े दिल में गरीबों की चिंता भरी...

मीडिया विमर्श (कविता)- मंगलेश डबराल

उन दिनों जब देश में एक नई तरह का बँटवारा हो रहा था काला और काला और सफेद और सफेद हो रहा था एक तरफ लोग...

नाना का घर – जादू-मंतर (बाल कथा)- अरशद खान

''कल मैं नाना के घर गया था। पूछो कैसे?'' शिब्बू अपने साथियों को इकट्ठा करके मौज-मस्ती कर रहा था। ''बस से।'' ''उहूँ।'' ''पापा के स्कूटर से।'' ''उहूँ।'' ''अपनी सायकिल से?'' ''उहूँ।'' ''तो...

आतंकवाद की किस्में (व्यंग्य)- राजकिशोर

जम्मू और कश्मीर के वर्तमान मुख्यमंत्री गुलाम नबी आजाद और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला एक आलीशान सोफे पर बैठे हुए थे। उनके सामने एक...

घनचक्कर (व्यंग्य)- विवेकी राय

कचहरी में बैठकर वह लगभग रो दिया था। ऐसा मामूली कार्य भी वह नहीं कर सकता? छोटे-छोटे आदमियों से असफल सिफारिश की खिन्‍नता लिए...

कानून के दरवाजे पर (लोककथा)- फ़्रेंज़ काफ़्का

कानून के द्वार पर रखवाला खड़ा है। उस देश का एक आम आदमी उसके पास आकर कानून के समक्ष पेश होने की इजाजत माँगता...

पाँव जमा है रावण का (कविता)- भगवत दुबे

सम्मानित हो रहे आज वे लहू, गरीबों का जिनने बेखौफ निचोड़ा है। शिलालेख अपने लिखवाते, रहा नहीं आँखों में पानी शोषक शब्द हुआ अनुवादित हरिश्चंद्र के जैसा दानी विध्वंशक पथ पर गांधी,...

चिकित्सा का चक्कर (व्यंग्य)- बेढब बनारसी

मैं बिलकुल हट्टा-कट्टा हूँ। देखने में मुझे कोई भला आदमी रोगी नहीं कह सकता। पर मेरी कहानी किसी भारतीय विधवा से कम करुण नहीं...