Monday, October 22, 2018

हमारी बेटियाँ (कविता) : आकांक्षा यादव

हमारी बेटियाँ घर को सहेजती-समेटती एक-एक चीज का हिसाब रखतीं मम्मी की दवा तो पापा का आफिस भैया का स्कूल और न जाने क्या-क्या। इन सबके बीच तलाशती हैं अपना भी वजूद बिखेरती...

हैरान थी हिन्दी (कविता)- दिविक रमेश

हैरान थी हिन्दी उतनी ही सकुचाई लजाई सहमी सहमी सी खड़ी थी साहब के कमरे के बाहर इज़ाजत मांगती मांगती दुआ पी.ए. साहब की तनिक निगाह की। हैरान थी हिन्दी आज भी आना पड़ा था...

जिंदा रहना चाहता है इंसान (कविता)- बोरीस स्लूत्स्की

जिंदा रहना चाहता है जिंदा इंसान। जिंदा रहना चाहता है मौत तक और उसके बाद भी। मौत को स्थगित रखना चाहता है मरने तक निर्लज्ज हो चाहता...

पाँव जमा है रावण का (कविता)- भगवत दुबे

सम्मानित हो रहे आज वे लहू, गरीबों का जिनने बेखौफ निचोड़ा है। शिलालेख अपने लिखवाते, रहा नहीं आँखों में पानी शोषक शब्द हुआ अनुवादित हरिश्चंद्र के जैसा दानी विध्वंशक पथ पर गांधी,...

मैं बेटी हूँ (बाल कविता)- जितेश कुमार

मम्मी कहती बिटिया रानी, तू घर की है चुनरी धानी। दुबकी गोद में लेटी हूँ, पापा की मैं बेटी हूँ। खूब चहकती घर के अंदर, धमाचौकड़ी घर में दर-दर। ए...

आकाश से गोलियों की बौछार (कविता)- बोरीस स्‍कीस्‍लूत्‍

आकाश से गोलियों की बौछार की तरह तालुओं को जला रही है वोदका आँखों से टपकते हैं तारे जैसे गिर रहे हों बादलों के बीच से और...

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना, हिन्दी लेखनी में एक ऐसा नाम जिनसे कोई...

सर्वेश्वर दयाल सक्सेना हिन्दी साहित्य जगत के एक ऐसे शख्स हैं, जिनकी लेखनी से कोई विधा अछूती नहीं रही। चाहे वह कविता हो, गीत...

घास की पुस्तक (कविता)- अर्सेनी तर्कोव्‍स्‍की

अरे नहीं, मैं नगर नहीं हूँ नदी किनारे कोई क्रेमलिन लिये मैं तो नगर का राजचिह्न हूँ।   राजचिह्न भी नहीं मैं उसके ऊपर अंकित तारा मात्र हूँ, रात...

अजनबी देश है यह (कविता) -सर्वेश्वरदयाल सक्सेना

अजनबी देश है यह, जी यहाँ घबराता है कोई आता है यहाँ पर न कोई जाता है जागिए तो यहाँ मिलती नहीं आहट कोई, नींद में जैसे...

मार्खेज को डिमेंशिया हो गया है (कविता)- अंशु मालवीय

मार्खेज को डिमेंशिया हो गया है। जीवन की उत्ताल तरंगों के बीच गिर-गिर पड़ते हैं स्मृति की नौका से बिछल-बिछलकर; फिर भरसक-भरजाँगर कोशिश कर बमुश्किल तमाम चढ़ पाते हैं...