Monday, December 17, 2018
Home संपादकीय

संपादकीय

    Editorial by Sushil Swatantra

    सरकार बुधनी की मौत पर लीपापोती न करती तो बच सकती...

    प्रधानमंत्री जी अपने सपनों के जिस भारत के निर्माण की दिशा में अग्रसर हैं, उसे उन्होंने ‘न्यू इंडिया’ का नाम दिया है, यानी एक...

    धूमिल होती महामंडलेश्वर पद की गरिमा और विश्वसनीयता

    संत समाज में महामंडलेश्वर की पदवी चाहे जितने भी प्रतिष्ठित क्यों न हो लेकिन गहरे विवादों के कारण इसकी गरिमा और विश्वसनीयता दिन-ब-दिन धूमिल...

    एक के बाद एक ढ़हते कम्युनिस्ट दुर्ग

    साम्यवाद का काबा माना जाने वाला सोवियत संघ जब भरभराकर ढ़ह गया, तब यह कहा गया कि विश्व की पूंजीवादी शक्तियों ने पूरी ताकत...

    युद्ध स्मारकों को जातीय चश्में से न देखा जाए

    नया साल हर तीन सौ पैंसठ दिनों के बाद आ जाता है लेकिन 2018 के पहले दिन को हम इस लिहाज से अलग कह...

    आसान नहीं है बद्री नारायण लाल हो जाना

    कम्युनिष्ट पार्टी के इतिहास में 21 मई 2017 कभी नहीं भुल पाने वाली वह तारीख है, जब साम्यवादी आन्दोलन का एक चमचमाता लाल सितारा...

    कौन बनाता है भारतीय मुसलामानों को संदिग्ध ?

    "जेंटलमैन, ब्लड ईज थिकर दैन वाटर " ⇒ मोहम्मद अली जिन्ना नेहरु और जिन्ना ने तो अपने स्वार्थ के कारण मुल्क को दो टुकड़ों में...

    संपादक मंडल

       सुशील स्वतंत्र संपादक      समानता के अधिकार और लोकतंत्र में गहरी आस्था रखने वाले सुशील एक निर्भीक पत्रकार होने के साथ-साथ प्रगतिशील युवा कवि और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं| उन्होंने...

    आग सब कुछ नहीं जला पाती…

    बहरहाल, समय बहुत ताकतवर है| इतना ताकतवर कि एक तरफ यह महरम बनकर पीड़ितों के जख्म भर रहा है, तो दूसरी तरफ गुजरात दंगों...

    पर्यावरण की रक्षा के लिए ईमानदार पहल की जरुरत

    पिछले दिनों दिल्ली सरकार ऑड-ईवन की वजह से खासी सुर्ख़ियों में रही| जहाँ एक ओर सरकार ने इसे प्रदूषण कम करने का कारगर तरिका...