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पं. सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ के जीवन से साक्षात् करें, तो निःसंदेह ‘महाकवि’ के रूप में उनका बिंब स्पष्ट उभरता है। ‘निराला’ ‘रहस्यवादी’ कवि हैं उनकी रहस्यात्मक अनुभूति का क्षेत्र अत्यंत व्यापक है, क्योंकि उन्होंने विराट सत्ता और शाश्वत ज्योति द्वारा रहस्यात्मक अनुभूतियाँ ग्रहण की हैं।

इस महाकवि का जन्म सन् 1953 में बंगाल के मेदिनीपुर के अंतर्गत महिषादल राज्य में हुआ था तथा देहावसान 15 अक्तूबर, 1961 को दारागंज, इलाहाबाद में हुआ था। उन्नाव जिले के गढ़कोला गाँव के निवासी थे, किंतु जीविकोपार्जन हेतु वे बंगाल चले गए थे। वहीं पर निराला का जन्म हुआ। निराला की प्रारंभिक शिक्षा बंगाल में ही हुई और वहीं से उन्होंने मैट्रिक परीक्षा उत्तीर्ण की।

कविता के प्रति प्रेम बचपन से ही रहा, उनकी प्रारंभिक कविताएँ बांग्ला भाषा में ही हुआ करती थीं। हिंदी की प्रेरणा उनको अपनी धर्मपत्नी से मिली थी। जो प्रतिदिन रामायण का पाठ बड़े सुमधुर कंठ से किया करती थीं। रामायण पढ़ने की उत्कट अभिलाषा से उन्होंने बँगला पढ़ना छोड़ दिया। वे आगे चलकर हिंदी और संस्कृत के आधिकारिक विद्वान् बन गए।

भारतीय दर्शन से निराला अतिशय प्रभावित थे। इसी से उनकी कविताओं में वेदांत का निखरा हुआ रूप सर्वत्र मिलता है। कवि होने के साथ-साथ वे एक कुशल गायक और संगीतज्ञ भी थे। उनकी कविताओं में शास्त्रीय संगीत का उत्कृष्ट रूप देखने को मिलता है।

यह एक सर्वमान्य तथ्य है कि ‘महाकवि’ का आसन समलंकृत करने का अधिकार उस विचक्षण को है, जिसने जीवन के विपरीत पहलुओं की अनुभूतियों को जिया और भोगा हो। अद्वैतवादी होने के कारण वे ब्रह्म सत्य जगन्मिथ्या के सिद्धांत को मानते थे, किंतु अद्वैतवाद की शुष्क भूमि में अपनी भक्तिपूर्ण सरसता को खोते नहीं, स्वयं उन्हीं के शब्दों में:
”मुक्ति नहीं चाहता मैं भक्ति रहे काफी सुधा धर की कला में,
अंशु यदि बनकर रहूँ तो अधिक आनंद है ।”

निराला की कविता में करुणा, वीर और रौद्र रसों के सजीव चित्र विद्यमान हैं, उनकी कल्पना इतनी मर्मस्पर्शी होती है कि पढ़ते ही एक अज्ञात व्यथा से समस्त शरीर क्षुब्ध हो उठता है; मन में एक बिजली सी कौंध जाती है। किसी भी रस का चित्रण करने में वे समान रूप से सफल रहे हैं। भाषा और भावों पर कवि का कुछ ऐसा अधिकार है कि उसमें एक प्रकार की संगीतात्मकता उत्पन्न हो जाती है, जिससे उनका प्रभाव और भी वेगशाली और अमिट हो जाता है।

निराला का मूल्यांकन वस्तुत: जो होना चाहिए वह अभी नहीं हुआ है। क्योंकि वे अपने युग से बहुत आगे रहे हैं। उनकी प्रतिभा, उनकी वाणी और उनका व्यक्तित्व इतना ‘प्रगतिशील’ रहा कि वर्तमान से वे निर्वाह न कर सके। उससे वे आजीवन जूझते ही रहे। महाप्राण का मूल्यांकन आगे आनेवाली पीढ़ियाँ करेंगी और तभी उनकी वाणी के नए-नए अर्थ और आकार खुलेंगे। सन् 1920 में रची गई कविता के जिन भावों की दुहाई अब भी दी जाती है, वह दर्शनीय है।

यह उस समय की कविता है जबकि हिंदी के अधिकांश कवि गगन-बिहारी बनकर क्षितिज के किसी कोने में अज्ञात प्रेयसी से अभिसार करने में रत थे। उस समय यही कवि धरती की कठोर चट्‌टानों पर अपने गीत लिखता था। इलाहाबाद स्थित दारागंज मुहल्ले की सड़कें आज भी साक्षी हैं, निराला के हर पाठ और हर संवेदना की:
”वह तोड़ती पत्थर देखा उसे मैंने इलाहाबाद के पथ पर
पड़ रही थी धूप गरमियोंके दिन दिवा का तमतमाता रूप,
उठी झुलसाती हुई लू, रुई ज्यों जलती हुई भू,
गर्द चिनकी छा गई, प्राय: हुई दुपहर ।”

उनकी अपौरुषेय प्रतिभा से प्रभावित होकर महीयसी महादेवी वर्मा ने एक बार कहा था-

”कवि-श्री निराला उस छाया-युग की कृति थे, जिसने जीवन में उभरते हुए विद्रोह को संगीत के स्वर का भाव रूपी मुक्त सूक्ष्म आकाश दिया। वे ऐसे युग का भी प्रतिनिधित्व कर रहे थे, जो उस विद्रोह का परिचय कठोर धरती पर विषम कला में ही देता है।”

सच, निराला की आत्मा नई दिशा खोजने के लिए सदा विकल रही। एक ओर उनका दर्शन, उन रहस्यमय सूक्ष्म तत्त्वों का साथ नहीं छोड़ना चाहता था, जो युग-युग का अर्जित अनुभूति वैभव है और दूसरी ओर उनकी पार्थिकता धरती के गुरुत्व से बँधी हुई थी, जो आज की पहली आवश्यकता है।

एक ओर उनकी सांस्कृतिक-दृष्टि पुरातन की प्रत्येक रेखा में उजले रंग भरती है तो दूसरी ओर आधुनिकता व्यंजना की ज्वाला में तपा-तपाकर सब रंग उड़ाती है। कोमल-मधुर गीतों की वंशी से ओज लेकर शंख तक उनकी स्वर साधना का उतार-चढ़ाव है। अब निराला के कोमल-मधुर गीतों की वंशी में कुछ अमर स्वर सुनिए-
“विजन वन वल्लरी पर सोती थी सुहाग भरी स्नेह स्वप्न मग्न अमल कोमल
तनुतरुणी जुही की कली दृग बंद किए–शिथिल पत्रांक में ।“

निराला का काव्य रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद के वेदांत, राष्ट्रप्रेम तथा रवींद्र के सौंदर्य-दर्शन एवं बंकिम के मार्मिक व्यंग्य-परिहास से ओत-प्रोत है। निराला के काव्य में दार्शनिक विचारों का समावेश है। समाज के शोषित वर्ग के साथ उनकी हार्दिक सहानुभूति है। एक याचक की व्यथा-कथा को निराला की ये पंक्तियाँ कितनी जीवंतता देती हैं :
“वह आता– दो टूक कलेजे के करता पछताता पथ पर आता,
पेट–पीठ दोनों मिलकर हैं एक, चल रहा लकुटिया टेक, मु
ट्ठी भर दाने को–भूख मिटाने को मुँहफटी पुरानी झोली को फैलाता
दो टूक कलेजे के कारण करता
पछताता पथ पर आता ।”

महाप्राण की ‘कुकुरमुत्ता’ काव्य-रचना तो जन-शोषकों की अशिष्ट दृष्टि और शब्दों के प्रति करारा कटाक्ष है। ‘गुलाब’ शोषक-रूप का प्रतीक है। यही नहीं, तथाकथित संभ्रांत श्रेणी का प्रतिनिधि भी है। निराला का शब्द-तीर का असर असह्य हो उठता है: निराला की साहित्यिक जीवन की साधना ‘समन्वय’ नामक पत्र के संपादन- काल से आरंभ हुई तथा ‘मतवाला’ तक पहुँचते-पहुँचते उनकी प्रतिभा निखरकर सर्वत्र बिखर गई। वस्तुत: निराला सब प्रकार के बंधनों से परे एक स्वच्छंद प्रकृति के कलाकार थे। बिना किसी शंका के उन्हें ‘युग-प्रवर्तक’ के अमर विशेषण से विभूषित किया जा सकता है।

जहाँ तक निराला के व्यक्तित्व का प्रश्न है, उन्होंने वैदिकयुगीन देब मूर्ति सा प्रशस्त ललाट पाया था। वे स्वतंत्रता, साहस और निर्भीकता की प्रतिमूर्ति थे। उनके दानशीलता का कोई सानी नहीं, एक बार एक कीमती ऊनी कोट पहनकर शीत-ऋतु में वे घूमने निकले थे और एक व्यक्ति को जाड़े से पीड़ित देखकर अपना कोट और कपड़े देकर वे एक लंगोट लगाए घर वापस आए। उन्होंने स्वयं पुराने कोट पर पूरा जाड़ा काट दिया था।

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