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मेरे बापू भी देश के बापू की तरह प्रयोगधर्मी थे। वे भी परिवार के लिए तरह तरह के प्रयोग किया करते थे। पर उनके असत्य के प्रयोग बहुत सफल हुए। सो हमारे परिवार ने उनके बाद भी वे प्रयोग विरासत के रूप में जारी रखे।

मेरे बापू के भी प्रयोगधर्मी होने के चलते उनके यहां से जाने के बाद ऊपर उनकी बापू से दोस्ती हो गई, कारण दोनों प्रयोगधर्मी जो थे। असल में मेरे बापू को ऊपर कोई नहीं मिल रहा था दोस्ती के लिए तो बापू को भी साथ के लिए वहां कोई प्रयोगधर्मी नहीं मिल रहा था। अब प्रयोग तो प्रयोग होते हैं। क्या सत्य के तो क्या असत्य के! वक्त पर जो काम आ जाए मेरे हिसाब से तो वही सत्य तो छोड़िए, परम सत्य होता है।

 सो उनमें गहरी दोस्ती हो गई। और अबके पितृपक्ष में मेरे बापू के श्राद्ध वाले दिन मेरे बापू साथ देश के बापू भी आ गए अबके अपनी जयन्ती पर। असल में मेरे बापू का श्राद्ध देश के बापू की जयंती वाले दिन होता है।

बापू के श्राद्ध में बापू के साथ देश के बापू भी आए तो मन गदगद हो गया। एक साथ श्राद्ध को घर में दो-दो बापू। मेरे वाले बापू ने असत्य के प्रयोगों से मेरा हरा भरा घर देखा तो अति प्रसन्न हुए। तब उन्होंने मुझे इन प्रयोगों को जारी रखने की सलाह भी दी। उन्हें प्रसन्नता थी कि मैं साउथ कोरिया से भी तेजी से असत्य के प्रयोग करते आगे बढ़ता जा रहा हूं। उन्हें यह देख कर भी प्रसन्नता हुई कि उनका परिवार साउथ कोरिया से भी दो कदम आगे है प्रयोगों को लेकर। दोनों बापुओं के पांव धुलवा उन्हें अपने बापू का श्राद्ध खिलाने ही लगा था कि देश के बापू ने पूछ लिया,‘ और भक्तजन! आजकल देश में क्या चल रहा है?’

बापू! विज्ञापनों में सबसे आगे फॉग तो अभियानों में आजकल देश में स्वच्छता अभियान सबसे आगे चल रहा है।’

‘मतलब अभी तक तुमने अपनी सफाई का ध्यान तक रखना शुरू नहीं किया, कह उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया तो मैंने कहा, ‘बापू! सच पूछो तो हमने अभी तक कुछ भी शुरू ही नहीं किया है।’

‘मतलब? पर तुम्हारे विकास की गूंज तो स्वर्गलोक तक सुनाई देती है। विकास के इत्ते बड़े बड़े विज्ञापन कि…कई बार देवता भी कहते फिरते हैं कि क्यों न अब स्वर्ग छोड़ इस देश में ही बस लिया जाए।’

 ‘बापू तुम ठहरे के सत्य के प्रयोगी। अपने बापू से तो उनके मरने के बाद भी झूठ ही कहा पर अब आप से झूठ कहूं तो किस नाते कहूं? सच तो यह है कि हम आजतक हर अभियान कागजों में ही चलाने में सफल हुए।’

‘मतलब, तुम्हारी महारत जमीन पर कोई भी सफल अभियान चलाने के बदले कागजों में ही चलाने की है?’ कहते हुए बापू मुझे घूरे तो मैं सहमा, सो मैंने बात को पलटती मारवाते कहा,‘ अरे बापू! क्या देश का रोना लेकर बैठ गए आप भी! चलो, ठूंस-ठूंस रोटी खाओ, मेरे बापू का श्राद्ध है। आज मैं डटकर पुण्य कमा लेना चाहता हूं।’

‘मतलब?’ पर एक देश के बापू थे कि चुप होने का नाम ही ले रहे थे। और अपने बापू ….अपना ही श्राद्ध चुपचाप खाए जा रहे थे, उंगलियां तक चाटते हुए।

अचानक अपने मुहल्ले के स्वच्छता मिशन के कैशियर आ धमके। उनसे आपका परिचय करवाऊं तो वे सरकारी नौकरी से कैशियर के पद से जबरदस्ती निकाले गए सरकारी पैसे को ठिकाने लगाने वाले सिद्ध हैं। उन्हें पूरा पता है कि कागजों में सरकारी कैश को कैसे पूरी ईमानदारी से डील किया जाता है ताकि कल को कोई किसी पर उंगली न उठा सके कि सरकारी धन का दुरूपयोग हुआ है। उनके पास सरकारी धन के दुरूपयोग को सदुपयोग में बदलने की ऐसी विलक्षण कला है कि पूछो ही मत।

 उन्होंने कमरे के बाहर असली बापू के से चप्पल देखे तो पूछा, ‘ घर मे कोई आया है?’

‘हां बापू का श्राद्ध है सो वे आए हैं।’

‘पर साथ में ये दूसरे जाने पहचाने से चप्पल किसके?’

‘देश के बापू के हैं’, सच कहना ही पड़ा।

 ‘मतलब देश के बापू तुम्हारे घर आए हैं?’

 ‘हां! मेरे बापू के साथ। दोनों ऊपर साथ-साथ रहते हैं, सो वे भी मेरे बापू के साथ आ गए’, मैंने लज्जाते हुए कहा तो वे बिदकते हुए बोले’, यार! आज तो हमारा मुहल्ला देश नहीं, दुनिया के मानचित्र पर आ गया’, कह वे मेरे ऐसे गले कि… ऐसे गले कि… मैं तो समझा था कि बच्चे! जिसको उम्र भर चोरी-चकारी के बाद भी अकड़ा कर चला, आज वह गर्दन गई।

‘मैं कुछ समझा नहीं गुरू?’

‘यार! मोदी जी बनारस में तो देश के असली बापू हमारे मुहल्ले में! आज का मुहल्ला स्वच्छता मिशन तो…. इस दारूण दृष्य को देख कर तो…. मीडिया वालों को खबर कर दो कि….’ और मुहल्ला स्वच्छता मिशन के कैशियर देश के बापू के सामने। बापू उस समय खीर खा रहे थे।

‘बापू एक आग्रह है आपसे! सबकुछ कहना, पर ‘न’ मत कहना’, घाघ उनके आगे हाथ जोड़े। बापू के हाथ का खीर का चमच हाथ में तो मुंह का मुंह में।

‘कहो, निवेदन नहीं, क्या आग्रह है?’

 ‘हमने आपकी जयन्ती वाले दिन पूरे लोकों में स्वच्छता मनाने की सोची है। और आज आप भी हैं। आप अपनी जयंती वाले दिन एक बार फिर आए, इससे बड़ी प्रसन्नता देश को हो या न, हमें तो है ही बापू!’

 ‘तो??’

 ‘बापू, बस आपका अधिक समय हम न लेंगे। जानते हैं , पूरे देश में मन रही अपनी जयंतियों में आपको हर जगह शिरकत करनी होगी। ऐसे में बस जब हम स्वच्छता के लिए अपने मुहल्ले के कचरे के आगे घुटने टेकें झाड़ू पकड़े तो प्लीज आप भी हमारे बीच झाड़ू लिए बस खड़े हों तो …..’

 ‘झाड़ू रोज क्यों नहीं देते अपने मुहल्ले में?’

‘उतना बजट सरकार देती ही कहां है बापू? दूसरे बापू! कचरे के साथ फोटो खिंचवाने का जो मजा है, वह कचरा उठाने में कहां? इधर प्रेस वालों ने फोटो खींचा, उधर मिशन हटा। बापू! अगर इस देश का कचरा खत्म हो गया तो फिर हम जैसों को खाने को बजट कहां से आएगा? इसलिए बजट खाने का तो बस कचरा फोटुओं में उठता दिखाने का। प्लीज बापू! न मत करना। हम यह सुनहरा मौका हाथ से किसी भी हाल में नहीं जाने देना चाहते। मुहल्ले की इज्जत का सवाल है बापू! आपके दोस्त के मुहल्ले की इज्जत का सवाल है बापू। और आपने तो अब हमारे मुहल्ले का नमक भी खा लिया है’, मुहल्ले स्वच्छता मिशन के कैशियर ने उन्हें नमक का वास्ता दिया तो वे पसोपेश में पड़ गए।

आपको तो क्या ही पता होगा, पर मुझे पता है कि अपने मुहल्ले के स्वच्छता मिशन का कैशियर कितना ढीठ है?  वह जिसको फांसने की एकबार ठान ले, उसको फांस कर की चैन लेता है।

और उसने बापू को भी फांस लिया।

आनन फानन में मुहल्ला स्वच्छता मिशन के प्रेस सचिव ने फ्री जिओ वाले सिम से अखबार, टीवी वालों को फोन किए कि देश के इतिहास में पहली बार अपनी जयंती पर खुद असली बापू हमारे मुहल्ले में पहली बार अपने स्वदेशी झाड़ू से सफाई करने आए हैं। अपनी जयंती के सुअवसर पर वे हमारे मुहल्ले में देश के कचरे को उठाने की कोशिश करेंगे।

मुहल्ला स्वच्छता मिशन के प्रेस सचिव का फोन सुनते ही सारे टीवी, अखबार वालों के सदा खड़े रहने वाले कान अबकी बार और भी खड़े हो गए। उनके आने पर मुहल्ले में इतना कचरा हो गया कि पूछो ही मत।

बापू यह सब देख डरे तो मैंने बापू को हौसला देते कहा‘, बापू! डरने का नहीं। प्रेस को शिद्दत से फेस करने का। आज का दौर, काम का दौर नहीं, केवल काम के प्रचार करने का दौर है।’

बाहर मीडिया वाले लाइव बापू को देखने को बेताब।

मैंने अपने बापू को भीतर ही रख तय समय पर देश के बापू को उनके हाथ में खालिस स्वदेशी झाड़ू लिए ज्यों ही मीडिया वालों से मिलवाया तो उनका बेचैनी से इंतजार कर रहे बाहर मीडिया वालों में हाहाकार मच गया। मीडिया वालों की अंदर की सांस अंदर तो बाहर की सांस बाहर। ये हम क्या देख रहे हैं? असली बापू? असली बापू सच्ची को ऐसे थे क्या? कुछ कमजोर दिल के  मीडिया वाले तो पहली बार असली बापू को देख बेहोश तक हो गए। …. और बपू के पीछे मुहल्ले के स्वच्छताग्रहियों की मुहल्ले की भीड़ एक दूसरे को गिराती हुई, पीछे धकियाती हुई। हर एक अपने अपने झाड़ू से एक दूसरे को किनारे हटाता, बापू के साथ सेल्फी लेने को उग्र-व्यग्र। तब मैंने फील किया कि बापू का दम घुटा जा रहा हो जैसे।

आह! मुहल्ले में इतना कचरा!

बापू मुहल्ले के कचरे के ढेर को देख आदतन कचरा को अपने झाड़ू से साफ करने लगे तो मैंने उनसे कहा, ‘बापू! कहा न! कचरा साफ नहीं करने का। बस! कचरे के ऊपर झाड़ू हवा में लहराने का।’

 ‘तो हाथ में ये स्वदेशी झाड़ू किसलिए?’ बापू गुस्साए।

  ‘दिखाने को कि देश के हाथों में सब की सीमाओं को लांघने वाला शक्तिशाली झाड़ू है।’

‘मतलब?’

‘हम आपके साथ बारी-बारी फोटो खिचवा अमर होना चाहते हैं बस!’

 ‘और ये कचरा?’

‘ये आगे भी काम आएगा न बापू! अभी तो स्वच्छता मिशन लंबा चलना है। बहुत बजट बचा है अभी।’

एकाएक मीडिया वाले भी एक दूसरे को अपने कैमरे थमा बापू के साथ अपना फोटो खिचवाने लगे। इस आपाधापी में कचरे का ढेर पूरे देश में और भी तेजी से फैल गया।

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हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले की अर्की तहसील के म्याणा गांव में जन्में डॉ. अशोक गौतम हिमाचल प्रदेश के उच्चतर शिक्षा विभाग में एसोशिएट प्रोफेसर के  पद पर कार्यरत हैं। उन्होंने हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय शिमला से साठोत्तर प्रमुख हिंदी नाटकों में अस्तित्ववादी-चेतना शोध विषय पर पीएच.डी किया है। मुख्य रूप से वे व्यंग्य लिखते हैं और “लट्ठमेव जयते”, “गधे ने जब मुंह खोला”, “झूठ के होलसेलर”, “खड़ा खाट फिर भी ठाठ”, “ये जो पायजामे में हूं मैं”, “साढ़े तीन आखर अप्रोच के”, “मेवामय ये देश हमारा”, “फेसबुक पर होरी”,  “पुलिस नाके पर भगवान”, “वफादारी का हलफ़नामा” और “नमस्कार को पुरस्कार” उनके प्रकाशित व्यंग्य संग्रह हैं। उनकी रचनाएं विगत 30 वर्षों से देश के प्रतिष्ठित अखबारों, पत्रिकाओं और वेब-पोर्टल्स में निरंतर प्रकाशित हो रही हैं। संपर्कः- गौतम निवास, अप्पर सेरी रोड, नजदीक मेन वाटर टैंक, सोलन, 173212 (हिमाचल प्रदेश) मोबाइल नम्बर : 9418070089, ई-मेल : [email protected]