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म्युनिष्ट पार्टी के इतिहास में 21 मई 2017 कभी नहीं भुल पाने वाली वह तारीख है, जब साम्यवादी आन्दोलन का एक चमचमाता लाल सितारा अपने साथियों को हमेशा के लिए अलविदा कह गया। गत 31 मई 2017 को पटना के आईएमए सभागार में भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी ने दिवंगत कॉमरेड बद्री नारायण लाल की स्मृति में सर्वदलीय श्रद्धांजलि सभा का आयोजन किया। श्रद्धांजलि सभा में बद्री बाबू की जीवनी और उनके योगदानों पर विस्तार से बातें हुई। तमाम वक्ताओं ने उनसे जुड़े संस्मरण साझा किए।

कॉमरेड बद्री नारायण लाल

अपनी सरलता और सहजता से किसी को भी प्रभावित कर लेने की अद्वितीय क्षमता के धनी बद्री बाबू का व्यक्तित्व विविधरंगी आयामों मिलकर बना था। वे एक सच्चे मार्क्सवादी, कर्मठ संगठनकर्ता और विधायी जीवन में ईमानदारी की ज्वलंत मिशाल होने के साथ-साथ एक बेहतरीन एवं प्रेरक पिता थे। दरअसल, सबके प्यारे बद्री बाबू की जीवन गाथा को किसी एक श्रद्धांजलि सभा में समेट पाना संभव ही नहीं है। और न किसी एक आलेख में उनके जीवन के हर पहलू को छू पाना संभव है। श्रद्धांजलि सभा में बोलते हुए वयोवृद्ध कॉमरेड गणेश शंकर विद्यार्थी ने बद्री बाबू के जीवन-संघर्ष को एक वाक्य में समाहित करते हुए कहा था कि बद्री बाबू को अगर सच्ची श्रद्धांजलि देनी है और अगर हमारे अन्दर जरा भी कम्युनिष्ट ज़िंदा है तो अपने आसपास जहाँ कहीं भी शोषण हो रहा हो, उसके खिलाफ लड़ाई खड़ी कीजिए ।” कॉमरेड गणेश शंकर विद्यार्थी ने बद्री बाबू को तब से देखा था जब वे शिक्षक की नौकरी छोड़कर प्रतिबंधित कम्युनिष्ट पार्टी को अपना जीवन समर्पित करने आए थे। उन्होंने भूमिगत रहकर पार्टी का काम शुरू किया था और आखिरी सांस तक उनकी सबसे बड़ी चिंता पार्टी और संगठन ही थी।

देहांत से चार महीने पहले ही (दिसंबर 2016 में) उनको पेसमेकर लगाया गया था। अस्वस्थ्य होने की अवस्था में भी कोई ऐसा पार्टी कार्यक्रम नहीं था, जिसमें किसी युवा की तरह बद्री बाबू शामिल होने के लिए आतुर न रहते हों। असल में उनके लिए जीवन में पार्टी-संगठन से बड़ी कोई और प्राथमिकता थी ही नहीं। अपने जीवन के आखिरी कार्यक्रम में वे पत्नी और घरवालों के हजार बार मना करने के बावजूद खगड़िया पार्टी संगठन सम्मेलन में भाग लेने ट्रेन से चले गए, जबकि डॉक्टरों ने उनको रेल यात्रा नहीं करने की सख्त हिदायत दी थी। वहीं जाकर बद्री बाबू को तेज बुखार आया। साथियों ने उनको सम्मेलन में भाग न लेकर आराम करने को कहा। बद्री बाबू बुखार की दवाई लेते रहे लेकिन उनका मन होटल में रुक कर आराम करने में नहीं लगा। वे दवाई खाकर रोजाना सम्मेलन सभागार में सबसे पीछे जाकर बैठ जाया करते थे। अपनी आखिरी साँस तक बद्री बाबू इस बुखार से पीड़ित रहे।

बद्री बाबू उन तथाकथित कम्युनिष्टों में से नहीं थे जो वैचारिक रूप बुलंद और बेहद वाचाल होते हैं लेकिन सामाजिक कुरीतियों और धार्मिक अंधविश्वासों के मामले में बगलें झाँकने लगते हैं। 1973 में उनके पिता स्वर्गीय नोखी लाल का निधन हुआ। उस समय का समाज प्रगतिशील विचारों को आसानी से स्वीकार नहीं कर पाता था, फिर भी सामाजिक मान्यताओं के विरुद्ध खड़े होकर बद्री बाबू ने पिता के देहांत के उपरांत किसी तरह का कर्मकांड नहीं होने दिया। बद्री बाबू मृत्यू के बाद के जीवन या पुनर्जन्म जैसी धारणा को अंधविस्वास मानते थे, इसलिए उन्होंने रामपुर के समस्त निवासियों को सूचित कर दिया था कि उनके पिता के दाह-संस्कार के बाद किसी ब्राह्मण को भोज नहीं कराया जाएगा। इकलौते पुत्र होने के बावजूद पिता की मृत्यू के बाद न तो उन्होंने अपने सिर के बाल मुंडवाए और न ही किसी तरह का क्रिया-क्रम (तेरहवीं आदि) किया। ऐसा ही 1994 में उनकी माताजी की मृत्यू के समय हुआ। बद्री बाबू किसी कॉमरेड को आडम्बर करते देख बहुत दुखी होते थे। यही कारण है कि उनके देहांत के बाद उनके विचारों को सम्मान देते हुए दोनों बेटों ने न तो केश-त्याग किया, न ब्राह्मण भोज और न ही किसी तरह का क्रिया-कर्म या संस्कार किया गया।

अपने बच्चों की शादी बद्री बाबू ने जाति-धर्म के बन्धनों और सामाजिक मान्यताओं से बहुत ऊपर उठकर किया। वे सच्चे अर्थों में प्रगतिशील विचार के साथ जीने वाले व्यक्ति थे, जो जाति और धर्म की दीवारों को लांघकर उच्च आदर्श स्थापित करने में यकीन रखते थे। उनकी पुत्री ने जब एक मुस्लिम कॉमरेड के बेटे से शादी की इच्छा जताई,  तब बद्री बाबू ने सामाजिक बंधनों की तनिक भी परवाह न करते हुए इस शादी को मंजूरी दे दी। इसी तरह उनके पुत्र ने भी अनुसूचित जाति की अपनी सहकर्मी से विवाह के लिए जब बद्री बाबू से इजाज़त माँगा, तब उन्होंने बिना दहेज लिए उस शादी की न सिर्फ सहर्ष अनुमति दी बल्कि शादी समारोह रामगढ़ में आयोजित कर बहुत अभिमान के साथ पुत्र का आदर्श विवाह करवाया। अपने दोनों बेटों की शादी में बद्री बाबू ने एक रूपया भी दहेज नहीं लिया और न ही कोई धार्मिक मंत्रोच्चारण या कर्मकांड हुआ। समाज में भी वे बिना तिलक-दहेज की शादी को हमेशा प्रोत्साहन देते थे। बद्री बाबू को इस बात का बहुत अभिमान था कि वे उस पार्टी से जुड़े हैं, जो उच्च आदर्शों और आचार-संहिता का पालन करने वाली इकलौती राजनितिक पार्टी है। वे कॉमरेड भुवनेश्वर शर्मा का उदाहरण हमेशा देते थे, जिनको विधायक होने के बावजूद पार्टी ने अपने बेटे की शादी में पच्चीस हजार रुपये दहेज देने की वजह से निष्कासित कर दिया था। बद्री बाबू कम्युनिष्ट पार्टी में आचार-संहिता की लगातार अनदेखी से दुखी थे। वे पार्टी के राष्ट्रिय परिषद् का सदस्य होने के नाते कई बार कॉमरेड्स के लिए पार्टी द्वारा तय किए गए आचार-संहिता के अनुपालन की अनिवार्यता का मुद्दा नेशनल काउंसिल मीटिंग उठा चुके थे, हालाँकि उनको इस बात का अफ़सोस भी था कि बदलते दौर में पार्टी के नेता और कॉमरेड्स आचार-संहिता को लेकर गंभीर नहीं रह गए हैं।

मार्च 2012 में भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी के 21वें महाधिवेशन के दौरान पटना में रैली

कम्युनिष्ट आन्दोलन के इतिहास में जब भी बद्री बाबू को याद किया जाएगा, एक जबरजस्त संगठनकर्ता के रूप में किया जाएगा। अविभाजित बिहार में उन्होंने संगठन निर्माण का काम शुरू किया। कॉमरेड जगन्नाथ सरकार की एक चिठ्ठी ने बद्री बाबू के जीवन की धारा ही मोड़ दी। वे युवावस्था में ही हाई स्कूल शिक्षक की नौकरी छोड़कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के पूरावक्ती कार्यकर्ता (होलटाइमर) बन गए और कॉमरेड चतुरानन्द मिश्र की मदद करने के लिए (तत्कालीन) बिहार के गिरिडीह में माईका मजदूरों के ट्रेड यूनियन का दायित्व संभाल लिया। इसके बाद बद्री बाबू ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। आज के झारखण्ड के सुदूर पठारी गाँव हो या कोयलांचल के दुर्गम इलाके, बद्री बाबू ने पैदल चलकर युवाओं और मजदूरों को प्रेरित करके पार्टी संगठन का गठन किया। हजारीबाग में पार्टी की नींव रखने के बाद बद्री बाबू को वहां के जिला मंत्री का कार्यभार पार्टी ने सौंपा। उन्होंने हजारीबाग को केंद्र बनाकर आस-पास के कई जिलों में लाल परचम बहुत शान से लहराया। अनेक मजदूरों-किसानों के आन्दोलन खड़े किए और उनका नेतृत्व किया। इसके बाद पार्टी ने उन्हें राज्य के केन्द्रीय नेतृत्व में रहकर काम करने का आदेश दिया और वे पटना बुला लिए गए।

वह पार्टी की अविभाजित बिहार राज्य परिषद, राज्य कार्यकारिणी, राज्य सचिवमंडल, राष्ट्रीय परिषद और राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में उल्लेखनीय भूमिका अनवरत निभाते रहे और बिहार विधान परिषद में दो टर्म तक भाकपा का प्रतिनिधित्व किया। विधान परिषद् में उनकी दमदार उपस्थिति को इतिहास में याद किया जाएगाउनके विधायी जीवन पर एक अलग आलेख में बात करना ही मुनासिब होगा

बिहार ही नहीं पूरे देश में जब कम्युनिष्ट आन्दोलन कमजोर पड़ रहा थासांप्रदायिक ताकतों ने जहर उगलना शुरू कर दिया था और सरकारें कॉर्पोरेट घरानों के तलवे चाट रही थीऐसे समय में बद्री बाबू 18 सितम्बर, 2004 में पार्टी की बिहार राज्य परिषद के सचिव निर्वाचित हुए और 7 जून, 2012 तक इस हैसियत से पार्टी का नेतृत्व किया। बिहार के पार्टी कामरेड्स में बद्री बाबू के राज्य सचिव बनने से उत्साह की लहर दौड़ गईपार्टी हर जिले में फिर से मजबूत होने लगीराज्य सचिव रहते हुए बद्री बाबू ने केन्द्रीय पार्टी नेतृत्व को पार्टी का 21 वाँ राष्ट्रीय महाधिवेषन पटना में करने का भरोसा दिलायाउस समय सभी साथियों को ऐसा लगा मानो उनका यह कदम दुस्साहस से भरा हैलेकिन बद्री बाबू फौलादी इरादों वाले नेतृत्वकर्ता थेउन्होंने एक करोड़ रुपये पार्टी फंड में जुटाने का कॉल दियाराज्य भर के सभी साथी लगन से इस लक्ष्य को पूरा करने में जुट गएआखिरकार पार्टी फंड से उम्मीद से कहीं ज्यादा चन्दा इकठ्ठा हो गया। 27 से 31 मार्च 2012 में जब भारतीय कम्युनिष्ट पार्टी का 21 वाँ राष्ट्रीय महाधिवेशन पटना में हुआ, तब देश भर के प्रतिनिधियों ने बिहार की पार्टी का लोहा मान लिया।  इसी महाधिवेशन में पार्टी के नये कार्यक्रम का मसविदा पेश हुआ जो 2015 के पुडुचेरी महाधिवेशन में स्वीकृत हुआ और आज पार्टी के क्रियाकलापों नीतियों की मार्गदर्षिका है। अपने कार्यकाल में बद्री बाबू ने पार्टी के बकाया भारी बिजली बिलों का भुगतान, पार्टी के जनशक्ति अखबार के पुनर्प्रकाशन और बिहार सरकार से बात करके जनशक्ति के भूमि आबंटन की लीज का नवीनीकरण जैसे महत्वपूर्ण कामों को अंजाम देकर पार्टी को अभूतपूर्व मजबूती प्रदान कियाअपनी मृत्यु के समय वे पार्टी की राज्य कार्यकारिणी के सदस्य थे।  

पिछले 17 मार्च को खगड़िया में पार्टी संगठन के सम्मेलन के दौरान बद्री बाबू को तेज बुखार आया, जिससे वे 21 मई को अपनी जीवन के आखिरी क्षण तक पीड़ित रहेउन्हें इलाज के लिए पहले रामगढ़ स्थित सीसीएल के अस्पताल में भर्ती करवाया गया, स्वास्थ्य में सुधार नहीं होने पर दो बार रांची के मेदंता अस्पताल में भर्ती रखा गयायहाँ भी स्थिति में सुधार देखकर उन्हें 21 अप्रैल को वेल्लौर स्थित सीएमसी हॉस्पिटल ले जाया गया, जहाँ इलाज के दौरान 21 मई को उन्होंने आखिरी साँस ली

पार्टी से बढ़कर बद्री बाबू के जीवन में कुछ और था ही नहींबद्री बाबू सबके प्रिय साथी थेबिहारझारखण्ड के लोग उन्हेंबद्री दाकहकर पुकारते थेवे सबको एक ही नजर से देखते थेउनके लिए कोई पराया नहीं थासबको अपना बना लेने की जादुई क्षमता थी बद्री बाबू मेंआज के समय में बद्री बाबू जैसा दूसरा नेता हो पाना असंभव हैउनके चले जाने से बिहारझारखंड के मर्माहत पार्टी सदस्यों को अच्छी तरह मालूम है कि मजदूर वर्ग, मेहनकश अवाम, समस्त दमित, उत्पीड़ित मानवता के लिए बद्री दा का जाना एक अपूरणीय क्षति है। 23 मई 2017 को उनके पार्थिव शरीर को वेल्लौर से उनके निवास स्थान रामगढ़ (झारखण्ड) लाया गयाकॉमरेड बद्री नारायण लाल को लाल सलाम और बद्री दा तेरे अरमानों को मंजिल तक पहुँचाएँगे, आसमान में गूंजते इन्हीं नारों के साथ लाल झंडे के इस सिपाही को उनके घर गीता सदन से लाल झंडे में लपेट कर दामोदर किनारे बने श्मशान घाट तक ले जाया गयाबद्री नारायण लाल जैसे साथी और नेता बारबार पैदा नहीं होते हैंऐसे बिरले कॉमरेड के अरमानों को मंजिल तक पहुंचाने का संकल्प सिर्फ बद्री बाबू को याद करने की सालाना रस्मअदायगी से पूरा नहीं हो पाएगा, बल्कि कम्युनिष्ट मूल्यों को आत्मसात कर समाजवाद की सच्ची लडाई को बुलंद करके ही बद्री दा के सपनों को पूरा किया जा सकता हैयही बद्री बाबू को सच्ची श्रद्धांजलि होगी

मृत्यू के बीस दिन पूर्व एक मई को जब उन्हें बताया गया कि आज मजदूर दिवस है, तब वे गहन चिकित्सा कक्ष में जीवट लड़ाके की तरह मौत को मात दे रहे थेथोड़ी देर के लिए वे भावशून्य होकर ऊपर देखते रहे, फिर उन्होंने उन नाजुक क्षणों में भी अपने मोबाइल फोन से पार्टी के साथियों को मई दिवस पर निम्नलिखित सन्देश प्रेषित करने के लिए कहा :

प्रिय साथी,

इस मई दिवस पर मेरी तबियत मेरा साथ नहीं दे रही है कि मैं आपके साथ कंधे पर लाल झंडा लेकर दुनियाँ के मजदूरों के हक़ में नारे बुलंद कर सकूँ, लेकिन आपको लड़ते रहना होगा

लाल सलाम

बद्री नारायण लाल

(CMC वेल्लौर के ICU वार्ड से)”    

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समानता का अधिकार और लोकतंत्र में गहरी आस्था रखने वाले सुशील एक निर्भीक पत्रकार होने के साथ-साथ प्रगतिशील युवा कवि और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं एवं साहित्यिक ई–पोर्टल्स में उनकी कविताएँ, आलेख और लघुकथाएँ प्रकाशित हो चुकी है। ग्रास-रूट जर्नलिज्म (ज़मीनी पत्रकारिता) उनके काम की विशेषता है। लेखन के साथ–साथ सामाजिक–सांस्कृतिक क्षेत्र में भी वे बेहद सक्रिय हैं। उन्होंने लम्बे समय तक एच.आई.वी./एड्स जागरूकताकेलिए उच्य जोखिम समूह के साथ काम किया है। सुशील हिंद वॉच मीडिया समूह के संपादक हैं। हिंद वॉच मीडिया समूह जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है। साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है। भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है।