Tuesday, July 17, 2018
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सुशील स्वतंत्र

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समानता का अधिकार और लोकतंत्र में गहरी आस्था रखने वाले सुशील एक निर्भीक पत्रकार होने के साथ-साथ प्रगतिशील युवा कवि और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं एवं साहित्यिक ई–पोर्टल्स में उनकी कविताएँ, आलेख और लघुकथाएँ प्रकाशित हो चुकी है। ग्रास-रूट जर्नलिज्म (ज़मीनी पत्रकारिता) उनके काम की विशेषता है। लेखन के साथ–साथ सामाजिक–सांस्कृतिक क्षेत्र में भी वे बेहद सक्रिय हैं। उन्होंने लम्बे समय तक एच.आई.वी./एड्स जागरूकताकेलिए उच्य जोखिम समूह के साथ काम किया है। सुशील हिंद वॉच मीडिया समूह के संपादक हैं। हिंद वॉच मीडिया समूह जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है। साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है। भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है।
मालिक की पूंजी का पेट मुनाफे से ही भरता है, इसलिए अखबार को हल हाल में छपना होता है। चाहे आतंकवादियों की गोली हो या न्यूजरूम का तनाव, पत्रकार की मौत के अगले दिन अखबार एक कॉलम प्रकाशित कर...
जिस मदर टेरेसा के नाम पर भारत ही नहीं पूरी दुनिया को अपार भरोसा है, उनकी संस्था में अगर बच्चों की कीमत पचास हजार से एक लाख बीस हजार रुपये तक तय कर दी जाती है, तो इसे सिर्फ...
आतंकवादी इस मंसूबे के साथ किसी आज़ाद आवाज़ को खामोश करने के लिए गोलियां चलाते हैं कि उनके गोलियों की दहशत से सच बोलने वाले डर जाएंगें लेकिन निडर पत्रकार शुजात बुखारी की हत्या की अगली सुबह फिर उसी...
प्रधानमंत्री जी अपने सपनों के जिस भारत के निर्माण की दिशा में अग्रसर हैं, उसे उन्होंने ‘न्यू इंडिया’ का नाम दिया है, यानी एक नया भारत। झारखण्ड से आ रही भूख के कारण हुए कथित मौतों की ख़बर और...
संत समाज में महामंडलेश्वर की पदवी चाहे जितने भी प्रतिष्ठित क्यों न हो लेकिन गहरे विवादों के कारण इसकी गरिमा और विश्वसनीयता दिन-ब-दिन धूमिल हो रही है।  हाल ही में हैदराबाद में एक मंदिर के पुजारी ने एक दलित युवक...
इसे दलितों को खुश करने के का नया हथकंडा कहें या धार्मिक एजेंडे का बदला स्वरूप, लेकिन ख़बर पक्की है कि  पहली बार किसी दलित को महामंडलेश्वर की उपाधि दी जा रही है। हाल ही में हैदराबाद में एक...
साम्यवाद का काबा माना जाने वाला सोवियत संघ जब भरभराकर ढ़ह गया, तब यह कहा गया कि विश्व की पूंजीवादी शक्तियों ने पूरी ताकत के साथ समाजवाद का अंत कर दिया। लेकिन उन विपरीत हवाओं में भी भारत में...
नया साल हर तीन सौ पैंसठ दिनों के बाद आ जाता है लेकिन 2018 के पहले दिन को हम इस लिहाज से अलग कह सकते हैं कि इस दिन ने देश के दो युद्ध स्मारकों को भी जातीय बहस...
मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां “ग़ालिब” जिन्हें हम प्यार से चचा ग़ालिब पुकारते हैं, उनका जिक्र तब तक रहेगा, जब तक इस दुनिया में शायरी रहेगी| चचा ग़ालिब उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर थे। इनको उर्दू भाषा का सर्वकालिक...
समय के साथ-साथ भारत रत्न डा. बी. आर. अंबेडकर की प्रासंगिकता और महत्व भारतीय राजनीति एवं सामाजिक चेतना के उत्थान में अहम होते चले जा रहे हैं| यहाँ तक कि दक्षिणपंथी ताकतों ने भी डॉ. अंबेडकर पर दावेदारी शुरू...
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