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24 साल के अर्जुन ने जब कांशीराम जी पर फिल्म बनाने को लेकर लोगों से मिलना शुरू किया तो कोई इस युवा पर भरोसा करने को तैयार नहीं था| इसकी वजह भी जायज थी| अर्जुन के पास न तो पैसे थे और ना ही वो कोई बड़े फिल्म मेकर थे, जिन पर लोग दांव लगाते| लेकिन अर्जुन को खुद पर भरोसा था| उन्होंने हिम्मत नहीं हारी| मां ने बेटे पर भरोसा कर जमीन बेंच दी, पत्नी ने गहने बेच दिए और अर्जुन ने भी इस मिशन को पूरा करने में अपनी पूरी जान लगा दी| आखिर में अर्जुन के हौंसले की जीत हुई और वो “द ग्रेट लीडर कांशीराम” नाम से फिल्म बनाने में कामयाब हो गए हैं| बहुत जल्दी ही यह फिल्म बड़े पर्दे पर रिलिज होने   वाली है| ‘दलित दस्तक’ पत्रिका के संपादक और हिंद वॉच संपादक मंडल के सदस्य अशोक दास ने से मिलने अर्जुन दिल्ली स्थित दलित दस्तक कार्यालय आए थे| प्रस्तुत है अर्जुन से अशोक दास की बातचीत बातचीत का मुख्य अंश :

फिल्म के क्षेत्र में रुझान कैसे हुआ?

– इस क्षेत्र में बचपन से रुझान था| मेरी कोई प्रॉपर ट्रेनिंग नहीं हुई लेकिन फिल्मों को देखने का मेरा नजरिया अलग था| मैं हमेशा फिल्मों को मेकिंग के नजरिए से देखा करता था| इसी रुझान की वजह से सन् 2012 में मुंबई गया| वहां एक मित्र के जरिए विजय सोलंकी (डायरेक्टर) से मिला| फिर पंचमढ़ी में फिल्म ‘चक्रव्यूह’ के लिए प्रकाश झा की टीम में काम किया| वहां से लौटने के बाद मैंने एक डाक्यूमेंटरी ‘अत्याचार’ बनाई| यह एक घंटे की थी| विषय था कि सरपंच गरीबों का शोषण कैसे करता है| इसे मैंने अपने शहर ग्वालियर में लोगों को दिखाया| दर्शकों का काफी बेहतर रेस्पांस मिला| मैंने कुछ पंजाबी एल्बम भी शूट किया|

कांशीराम के मुद्दे पर फिल्म बनाने का ख्याल क्यों आया?

– मैंने बामसेफ के कैडर को नजदीक से देखा है| तब मान्यवर साहेब के बारे में जानकर उनसे काफी प्रभावित हुआ| जब इस फिल्ड में आया तो सोचा कि मुझे कांशीराम साहब पर फिल्म बनानी है| 2013 में तय कर लिया| पूरे साल फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम किया| स्क्रिप्ट लिखने में इसमें मेरे साथ डॉ. एम.आर रायपुरिया भी रहे| उन्होंने मान्यवर पर पी.एचडी की है| 2014 में राजू भारती (सिंगर) से भोपाल में मुलाकात हुई| इनको पहले से सुना हुआ था सो उनसे गाने की लिरिक्स लिखने का अनुरोध किया| फिल्म अक्टूबर 2015 में फाइनल हो चुकी है| इसे सेंसर बोर्ड को जनवरी, 2016 में भेज दिया है|

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“द ग्रेट लीडर कांशीराम” फिल्म के निर्माता-निर्देशक अर्जुन सिंह

फिल्म के बारे में बताइए

– फिल्म एक घंटे 45 मिनट की है| इसमें कांशीराम जी के बचपन से लेकर 1984 तक के जीवन को दिखाया गया है| इसमें दो गाने हैं| 50 मुख्य कैरेक्टर हैं| कांशीराम जी की भूमिका राघवेन्द्र सिंह राठौर ने निभाई है| वो एनएसडी के पूर्व छात्र हैं और फिलहाल थियेटर और टीवी कर रहे हैं| कांशीराम जी के बचपन का कैरेक्टर मास्टर अरूण मौर्य कर रहे हैं| मायावती जी का कैरेक्टर सोमा गोयल (थियेटर आर्टिस्ट), दीनाभाना का कैरेक्टर (महेश यादव), मनोहर आटे (साहब के रूम पार्टनर थे मुंबई में) का कैरेक्टर राज ने किया है| प्रोडेक्शन हेड धर्मेन्द्र बघेल हैं और सिंगर राजू भारती हैं|

फिल्म बनाने के समय क्या चुनौती थी?

– फिल्म प्लान करने के बाद बुद्धीजिवियों और पार्टी (बसपा) के लोगों के पास गया तो लोगों ने मुझे हल्के में लिया| किसी ने मुझ पर भरोसा नहीं किया| तब रायपुरिया जी इकलौते थे जिन्होंने मुझ पर भरोसा किया| उन्होंने मुझे हर तरह से मदद भी की| मैं उनसे मिलने सायकिल से उनके घर पहुंचा था| मैंने उन्हें प्लान बताया तो उन्होंने कहा कि कैसे करोगे, तुम तो साइकिल से आए हो| उनका इशारा फिल्म में आने वाली लागत से था| मैंने कहा कि मान्यवर कांशीराम जी ने भी शुरुआत साइकिल से ही की थी| मेरे इस जवाब को सुनकर वह बेहद खुश हुए और फिल्म की स्क्रिप्ट लिखने को राजी हो गए|

उन्होंने मुझे कांशीराम जी के घरवालों से मिलने का सुझाव दिया| मैं मान्यवर के घर रोपड़, पंजाब खवासपुर गया और उनके घरवालों से परमिशन ली| तब मुझे एक प्रोडक्शन हाउस बनाना था| मैं मुंबई गया| वहां फिल्म प्रोड्क्शन हाउस का रजिस्ट्रेशन करवाया| यह मैंने बाबासाहेब के नाम पर ‘बाबा फिल्म मेकर’ करवाया| वहां से लौटने के बाद ऑडिशन किए| कलाकारों का चुनाव करने के बाद उन्हें फिल्म के कैरेक्टर के हिसाब से ट्रेंड किया| जिस पात्र के लिए जो कैरेक्टर अच्छा लगा, उसे कास्ट करता गया|

बजट का इंतजाम कैसे हुआ?ajn-2

 मेरा बजट 20 लाख रुपये का था| स्टोरी लिखने के बाद उसे लेकर लोगों के पास गया| तब लोगों को विश्वास होने लगा| कुछ नेताओं से भी मिला| उन्होंने कहा कि बजट बढ़ाओ अच्छे से करेंगे| लेकिन अचानक नेताओं ने हाथ खींच लिया| स्थिति यह आ गई कि फिल्म रोक दी जाए| मेरे पिताजी नहीं हैं| मैंने अपनी मां से बात की| उन्होंने मुझपर भरोसा किया| इस तरह मैंने जमीन बेच कर 25 लाख रुपये जुटाए| मैं ग्वालियर संभाग के बामसेफ के लोगों से मिला जिन्होंने मुझे 3 लाख रुपये का सपोर्ट किया| बजट बढ़ता जा रहा था| तब मैंने फिल्म का ट्रेलर बनाकर स्पांसर और को-प्रोड्यूसर बनाना शुरू कर दिया| अनिल बजाज, धर्मेन्द्र राठौड़ एसोसिएट प्रोड्यूसर विनोद कुमार सेवरिया को-प्रोड्यूसर के रूप में जुड़े| हालांकि दिक्कतें खत्म नहीं हो रही थी| तब मुझे अपनी पत्नी अर्चना सिंह मौर्य ने बहुत सपोर्ट किया| उसने अपने सारे गहने बेचकर मुझे डेढ़ लाख रुपये दिए| 35 लाख रुपये में पूरी फिल्म बन चुकी है| प्रोमोशन के लिए हमने 15 लाख का बजट रखा है| हम चाहते हैं कि यह फिल्म मायावती जी को दिखाएं|

साभार : दलित दस्तक डॉट कॉम

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बुद्ध भूमि बिहार के छपरा जिले के मूलनिवासी अशोक दास ने गोपालगंज कॉलेज से राजनीतिक विज्ञान में स्नातक (आनर्स) करने के बाद सन् 2005-06 में देश के सर्वोच्च मीडिया संस्थान ‘भारतीय जनसंचार संस्थान, जेएनयू कैंपस दिल्ली’ (IIMC) से पत्रकारिता में डिप्लोमा किया है। 2006 से मीडिया में सक्रिय हैं। लोकमत, अमर उजाला, भड़ास4मीडिया और देशोन्नति (नागपुर) जैसे प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों में काम कर चुके हैं। उन्होंने पांच साल तक कांग्रेस, भाजपा सहित तमाम राजनीतिक दलों, विभिन्न मंत्रालयों और पार्लियामेंट की रिपोर्टिंग की। वे ‘दलित दस्तक‘ मासिक पत्रिका के संस्थापक एवं संपादक हैं। मई 2012 से लगातार पत्रिका वंचितों की आवाज को मुखरता से उठा रही है| अशोक दास द्वारा शुरू की गयी दलित दस्तक पत्रिका का जून 2017 में वेब चैनल (www.youtube.com/c/dalitdastak) के रूप में विस्तार हुआ है, जिसे बहुत तेजी से लोकप्रियता मिली है| अशोक हिंद वॉच मीडिया के संपादक मंडल के सदस्य हैं| हिंद वॉच मीडिया जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है| साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल और सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है| भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है|