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प्रिय प्रधानमंत्री जी,
न आप गांधी है और न अडानी-अंबानी, जमनालाल बजाज है…
“उद्योगपतियों के साथ खडे होने पर आप भले न डरे, लेकिन सोचिए जरूर, आप किसके साथ खडे हैं?”

गांधी जी की बात बाद में। आजकल आप नेहरू को बहुत याद करते है। सो, पहले नेहरू की बात। नेहरू भी उद्योगपतियों के साथ खडे होने में नहीं डरते थे। लेकिन, जानते है आप, वो किस बात के लिए और कैसे उद्योगपतियों के साथ खडे होते थे।

साल 1959 की बात है। इन्दौर में हुकुमचन्द मिल खुला। इस मिल की व्यवस्था में श्रमिकों को भी बराबरी की हिस्सेदारी दी गई थी। ये एक तरह से गांधी जी की ट्रस्टीशीप व्यवस्था लागू करने जैसा था। मिल के शुभारंभ के मौके पर पंडित नेहरू भी पहुंचे थे। उद्योगपति थे महावीर प्रसाद आर मोरारका। बकायदा नेहरू जी ने तस्वीर भी खिंचवाई और मीडिया में तब वह तस्वीर भी प्रकाशित हुई थी। नेहरू जी को भय नहीं था, क्योंकि वो जानते थे एक उद्योगपति ने कितना शानदार काम किया है और काम की सराहना करना गलत नहीं है। ये पंडित नेहरू ही थे, जिन्होंने इस देश में बान्धों को, उद्योगों को आधुनिक भारत का मन्दिर कहा था।

(उद्योगपति जमना लाल बजाज के साथ गांधी जी और सुभाष चन्द्र बोस)

प्रिय प्रधानमंत्री जी, आपने गांधी जी की बात कही कि वो भी उद्योगपतियों के साथ रहते थे। आप जेपी की बात शायद भूल गए। बोल देते कि गोयनका की मदद के बिना जेपी अपना लक्ष्य हासिल न कर पाते। लेकिन, आपके इतना कहने के कई अर्थ निकाले जाएंगे। जो अर्थ आप निकाल रहे है, उसका नतीजा देश के लिए, समाज के लिए कितना नकारात्मक होने वाला है, आपको शायद अन्दाजा नहीं। आपने एक झटके में अपने कृत्य की तुलना गांधी से कर दी और दूसरे ही झटके में अडानी-अंबानी जैसे मुनाफाखोरों को जमनालाल बजाज, बिरला, गोयनका की श्रेणी में ला दिया।

गांधी ने तो अंग्रेजों के खिलाफ लडाई में उद्योगपतियों के साथ खडा होना पसन्द किया। उद्योगपति भी ऐसे, जो बिजनेस के साथ-साथ न सिर्फ आजादी की लडाई लडते थे, बल्कि मुनाफा का एक बडा हिस्सा समाज को पे बैक भी करते थे। जमनालाल बजाज आजादी की लडाई लडे, समाज सुधार का काम किया, गांधी जी के लिए अश्रम बनवाएं और भारत की आर्थिक तरक्की में भी योगदान दिया। क्या इसी भरोसे के साथ हम कह सकते है कि 1990 के बाद के दौर के सभी नेता, जो उद्योगपतियों के साथ खडे दिखते है, उनकी मदद ले कर गरीबी से लड रहे है। अंग्रेज तो है नहीं। तो आप बताईए देश को कि आप जिन उद्योगपतियों के साथ खड़े हैं, वे किसके खिलाफ लड़ रहे हैं। गरीबी के खिलाफ या गरीबों के खिलाफ।

आजादी के बाद, जब गोयनका को लगा कि निरंकुश सत्ता का विरोध होना चाहिए, तो उन्होंने जेपी का साथ दिया। प्रिय प्रधानमंत्री जी, आज आप एक ऐसा उद्योगपति ढूंढ कर बता दीजिए, जो सत्ता के खिलाफ एक लाइन बोलने की हिम्मत रखता हो। 2014 के चुनाव में आप जिस उद्योगपति के प्लेन में घूमते थे, उन अडानी साहब ने कौन सा जनकल्याण का काम किया है? शायद, आपको पता न हो, सरगुजा के पारसा केंटे में अभी जो कोयला खनन का काम अडानी महोदय कर रहे है, उसमें करीब 1000 हेक्टेयर क्षेत्र में फैले जंगल को काटने का प्रस्ताव है। अगर वह जंगल कट गया तो किसका फायदा होगा, किसका नुकसान? इसके बारे में सोचिएगा, फिर देश को बताईए कि आपको अडानी साहब के साथ खडे होने में डर क्यों नहीं लगता?

(उद्योगपति मुकेश अम्बानी और उनकी पत्नी के साथ आत्मीय मुद्रा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी)

मीडिया को संसदीय मर्यादा तार-तार होता नजर आता है, जब संसद में राहुल गांधी आपको गले लगा लेते है। मुझे मेरी देश की मर्यादा तब तार-तार होती नजर आई थी, जब एक व्यापारी ने आपकी पीठ पर हाथ रख दिया था।

मुझे उद्योगपतियों से न नफरत है, न कोई पूर्वाग्रह। लेकिन, एक आम नागरिक की हैसियत से मुझे उस घर को देख कर जलन होती है, जो 6 हजार करोड रुपये में बनाई जाती है। मैं वह पहेली नहीं समझ पाता कि कैसे कोई आदमी मेहनत की कमाई से अपने लिए 6 हजार करोड रुपये का घर बना सकता है।

प्रिय प्रधानमंत्री जी, यदि आपको लगता है कि सिर्फ और सिर्फ ईमानदारी से कोई ऐसा कर सकता है, तो प्लीज वह पहेली जनता के सामने सुलझा कर रखिए। हां, एकाध पहेली मैं जानता हूं। केजी बेसिन से ले कर जियो तक। मुझे समझ नहीं आता कि कैसे कोई कंपनी मुफ्त में सबकुछ दे कर भी हजारों करोड रुपये का मुनाफा कमा लेती है। और उसका असर ये होता है कि बाकी की टेलिकॉम कंपनियां लगातार घाटा उठाते हुए बन्दी की कगार पर पहुंच जाती है। प्लीज बताईए, क्या अभी भी आपको ऐसे उद्योगपतियों के साथ खडे होने में डर नहीं लगता?

(मुकेश अम्बानी की कम्पनी के विज्ञापन में प्रकाशित की गयी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तस्वीर)

आपने एक अच्छी बात कही। उद्योगपति भी देश के विकास में योगदान देते है। उन्हें चोर-लुटेरा नहीं कह सकते। लेकिन, आपके आने के बाद से 23000 अमीर देश छोड कर जा चुके है। क्या सब के सब भ्रष्ट थे? चार-पांच उद्योगपति भगोडे बन चुके हैं। माल्या भागता फिर रहा है। आपने दिवालिया कानून बना दिया। एक आम उद्योगपति अपने जीवन भर की कमाई से एक कंपनी खडा करता है। किसी मुसीबत के कारण कर्ज नहीं चुका पाता तो आप उसका रास्ता निकालने के बजाए, उसकी कंपनी नीलाम करवा रहे है। आपके कडे कानून की वजह से सब देश छोड कर भाग जाते है। एक तो आर्थिक माहौल खराब होता है, दूसरा जो पैसा डूबा, उसके आने की उम्मीद भी खत्म हो जाती है। आप चाहते तो बीच का रास्ता निकालते। लेकिन, नहीं। आप अपने मतदाता को ये सन्देश देना चाहते है कि मैं सख्त हूं और सख्त कार्रवाई करूंगा। करिए। लेकिन, इसमें नुकसान किसका हो रहा है, ये कुछेक साल बाद पता चल जाएगा। मेरे जैसा आदमी हर किसी उद्योगपति को चोर-लुटेरा नहीं मानता। लेकिन, जो मुनाफाखोरी के लिए हवा-पानी-जमीन को जहर बना रहा है, उसे हम जरूर चोर-लुटेरा बोलेंगे।

प्रिय प्रधानमंत्री जी, आपका एक फेवरेट वन-लाइनर है, आधा ग्लास हवा से भरा है, जिसे मैं अक्सर कहता हूं कि नहीं, ग्लास का आधा पानी कोई चुरा ले गया है। लेकिन, ये आपकी पॉजिटिव थिंकिंग की हाइट है, जहां आप आधा ग्लास पानी के चोर को ढूंढने के बजाय ग्लास को पूरा भरा बता देते है। आधा पानी से भरा और आधा हवा से भरा। मैं इस देश का एक आम मेहनतकश नागरिक हूं, जो पूरी मेहनत करने के बाद भी अपने लिए शुद्ध पानी तक का इंतजाम नहीं कर पाता। उस पर भी आधा ग्लास हवा से भरा है।

प्लीज सर, आप आधा ग्लास पानी के चोर को पकडिए। और हां, अगली बार किसी के भी साथ खड़ा होने से पहले ये जरूर देखिए कि वह आदमी किसके साथ खडा है, देश के साथ या देशवासियों के खिलाफ…
शशि शेखर

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