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पाँच हजार साल बाद
इन अँधेरी गलियों में
अभी-अभी

सूरज की कुछ किरणें फैलीं
उजाला हुआ पल में
गिरे हैं कुछ खंडहर
अभी अभी

जमीं में गाड़ दिया था जिन्हें
वे सर जरा ऊपर उठे
आँखों ने देखा
आसमाँ

अभी-अभी
तप कर लाल हुई
अस्तित्व की काली
छाया

अभी-अभी
दिल के द्वार
खुले
जरा से होंठ
हिले
उद्घोषित हुआ

रुग्ण इतिहास के
कलेजे को चीरता
गर्म, उग्र, सख्त
फिर भी बहुत हितकर
शब्द

समय के बलशाली
हाथ ने लिख दिया
जीवन किताब में
शब्द : आंबेडकर… आंबेडकर !

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