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हाथरस।अलीगढ रोड स्थित प्रजापिता ब्रह्माकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय के आनन्दपुरी कालोनी में बसौड़ा के अवसर पर अपने सम्बोधन में राजयोग प्रशिक्षिका बी0के0 शान्ता बहिन ने भारतीय संस्कृति में मनाये जाने वाले पावन पर्वों के पीछे छिपे हुए आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक रहस्यों को समझने का आव्हान किया।

उन्होंने इन पर्वों के केवल एक परिपाटी, धार्मिक अनुष्ठान या कर्मकाण्ड के अनुसार न मनाये जाने बल्कि उसके पीछे बताये गये भावार्थों को जानने की बात कही।

बी0के0 शान्ता बहिन ने कहा कि यूं तो बसौड़ा को शीतला अष्टमी के रूप में मनाया जाता है परन्तु कई स्थानों पर इसे होली के बाद आने वाले सोमवार को ही मनाया जाता है।

शीत ऋतु जा रही है, ग्रीष्म का आगमन हो रहा है। इस मौसम परिवर्तन के समय ऋतु परिवर्तन के बाद चेचक, हैजा आदि बीमारियों का प्रकोप आरम्भ हो जाता है यह सभी बीमारियाँ अस्चच्छता के कारण ही होती हैं।

शीतला देवी के एक हाथ में जल पात्र तो दूसरे हाथ में झाडू़ होती है। यह झाडू स्वच्छता का प्रतीक है, जितना बाहर स्वच्छ होगा उतना ही इन बीमारियों से बचे रहेंगे। जल का पात्र जल को ढककर रखने और संचय करके सदुपयोग करने का प्रतीक है।

गर्मी में जितना जल का प्रयोग करेंगे उतना लू आदि से बचे रहेंगे। गधे की तरह हठी नहीं बनना है उस हठी मन पर विजय प्राप्त करना हठता पर सवारी है जो शीतला देवी को दिखाया जाता है।

बसौड़ा मनाने का दूसरा भावार्थ यह भी बताया कि पाक पकचान जो सर्दी के मौसम में खराब नहीं होते थे अब गर्मी में जल्दी ही खराब होना आरम्भ हो जायेंगे और खराब पकवान का प्रयोग भी बीमारियों को जन्म देता है। इसलिए बसौड़े के बाद बासी पाक पकवानों का प्रयोग बन्द करने का अभिप्राय है।

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हर की स्वच्छता तभी होगी जब अन्दर मन में स्वच्छता होगी। मन को साफ करने का सहज साधन एक परमपिता परमात्मा शिव की याद का राजयोग है जिस योग अग्नि से आत्मा के मैले संस्कार भष्म हो जाते हैं।

राजयोग कक्षा में प्रमुख रूप से बी0के0 कैप्टन अहसान सिंह, बी0के0 उमा बहिन, बी0के0 श्वेता बहिन, बी0के0 लवली, बबली, सुमन, रामेश्वर दयाल, पूर्व फौजी केशवदेव, यतेन्द्र आर्य, मनोज कुमार, ममता माता, टिवंकल खन्ना, गजेन्द्र भाई, दाऊदयाल अग्रवाल, विमलेश बहिन, उर्मिला बहिन, पार्वती, रामप्यारी, सरोज, सोनदेवी, वेदवती आदि अनेक ब्रह्मावत्स उपस्थित थे।

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