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मिर्ज़ा असद-उल्लाह बेग ख़ां “ग़ालिब” जिन्हें हम प्यार से चचा ग़ालिब पुकारते हैं, उनका जिक्र तब तक रहेगा, जब तक इस दुनिया में शायरी रहेगी| चचा ग़ालिब उर्दू एवं फ़ारसी भाषा के महान शायर थे। इनको उर्दू भाषा का सर्वकालिक महान शायर कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी| फ़ारसी कविता के प्रवाह को हिन्दुस्तानी जबान में लोकप्रिय करवाने का श्रेय चचा को ही है।  ग़ालिब के लिखे पत्र को उर्दू लेखन का महत्वपूर्ण दस्तावेज़ माना जाता है। ग़ालिब का नाम भारत और पाकिस्तान ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया में जहाँ कहीं भी शायरी की बात होती है, एहतराम के साथ लिया जाता है।

उन्हे दबीर-उल-मुल्क और नज़्म-उद-दौला का खिताब मिला। ग़ालिब नाम से लिखने वाले मिर्ज़ा मुग़ल काल के आख़िरी शासक बहादुर शाह ज़फ़र के दरबारी कवि भी रहे थे। आगरा, दिल्ली और कलकत्ता में अपनी ज़िन्दगी गुजारने वाले चचा  ग़ालिब को उनकी बेशकीमती ग़ज़लों और शेरों के लिए तब तक याद किया जाएगा जब तक शायरी ज़िंदा रहेगी। या फिर ये कहें कि जब तक ग़ालिब को याद किया जाएगा, शायरी ज़िंदा रहेगी।

पेश है उनके खजाने से चुने गये 10 बेहद मशहूर और ज़िंदा शेर…

1.
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक
(पूरी ग़जल पढ़ें)

2.
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ाइल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
(पूरी ग़जल पढ़ें)

3.
कहाँ मय-ख़ाने का दरवाज़ा ‘ग़ालिब’ और कहाँ वाइज़
पर इतना जानते हैं कल वो जाता था कि हम निकले
(पूरी ग़जल पढ़ें)

4.
बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना
(पूरी ग़जल पढ़ें)

5.
हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और
(पूरी ग़जल पढ़ें)

6.
हम को मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन
दिल के ख़ुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है
(पूरी ग़जल पढ़ें)

7.
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले
(पूरी ग़जल पढ़ें)

8.
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता
(पूरी ग़जल पढ़ें)

9.
मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले
(पूरी ग़जल पढ़ें)

10.
इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना
(पूरी ग़जल पढ़ें)

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समानता और लोकतंत्र में गहरी आस्था रखने वाले सुशील एक निर्भीक पत्रकार होने के साथ-साथ प्रगतिशील युवा कवि और सामाजिक कार्यकर्ता भी हैं। अनेक प्रतिष्ठित पत्र–पत्रिकाओं एवं साहित्यिक ई–पोर्टल्स में उनकी कविताएँ, आलेख और लघुकथाएँ प्रकाशित हो चुकी है। ग्रास-रूट जर्नलिज्म (ज़मीनी पत्रकारिता) उनके काम की विशेषता है। लेखन के साथ–साथ सामाजिक–सांस्कृतिक क्षेत्र में भी वे बेहद सक्रिय हैं। उन्होंने लम्बे समय तक एच.आई.वी./एड्स जागरूकता और बचाव के लिए उच्य जोखिम समूह के साथ काम किया है। सुशील हिंद वॉच मीडिया समूह के संपादक हैं। हिंद वॉच जमीनी सरोकारों से जुड़ी जनपक्षधरता की पत्रकारिता कर रहा है। साप्ताहिक अखबार, न्यूज़ पोर्टल, वेब चैनल, मोबाइल ऐप और व्यापक सोशल मीडिया नेटवर्क के माध्यम से जमीनी और वास्तविक ख़बरों को निष्पक्षता और निडरता के साथ अपने पाठकों तक पहुंचाने के लिए हिंद वॉच मीडिया पूरी समर्पण से काम करता है। भारत और विदेशों में यह वेब पोर्टल पढ़ा जा रहा है।